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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 8
सानुमती- नन्वीदृशानि तपस्विन्या भागधेयानि । विदूषकः- (अपवार्य) लद्खित एष भूयोऽपि शकुन्तलाव्याधिना । न जाने कथं चिकित्सितव्यो भविष्यतीति । कञ्चुकी-(उपगम्य) जयतु जयतु देवः । महाराज, प्रत्यवेक्षिताः प्रमदभूमयः । यथाकाममध्यास्तां विनोदस्थानानि महाराजः । राजा-- वेत्रवति, मदचनादमात्यमार्यपिशुनं ब्रूहि । चिरप्रबोधान्न सम्भावितमस्माभिरद्य धमसिनमध्यासितुम्‌ । यत्प्त्यवेक्षितं पौरकार्यमार्येण तत्पत्रमारोप्य दीयतामिति । प्रतिहारी-- यदेव आज्ञापयति । (जं देवो आणवेदि) । (इति निष्क्रान्ता) । राजा-- वातायन, त्वमपि स्वं नियोगमशुन्यं कुरु । कञ्चुकी-- यदाज्ञापयति देवः । (इति निष्क्रान्ता) । विदूषकः-- कृतं भवता निर्मक्षिकम्‌ । साम्प्रतं शिशिरातपच्छेद्रमणीयेऽ स्मिन्‌ प्रमदवनोदेश आत्मानं रमयिष्यसि । राजा-- वयस्य, रन्धोपनिपातिनोऽनर्था इति यदुच्यते तदव्यभिचारि वचः । मुनिसुताप्रणयस्पृतिरोधिना मम च मुक्तमिदं तमसा मनः । मनसिजेन सखे प्रहरिष्यता धनुषि चूतशरश्च निवेशितः ।।
सानुमती:-- उस बेचारी (शकुन्तला) के भाग्य ही ऐसे हैं । विदूषक:-- (एक ओर मुंह करके) यह फिर शकुन्तला के रोग से आक्रान्त (ग्रस्त) हो गये । न जाने कैसे इनकी चिकित्सा होगी ? कञ्चुकी:-- (समीप में जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । महाराज प्रमदवन के स्थान (मेरे द्वारा) भली-भाँति देख लिये गये हैं । महाराज, (अब आप) इच्छानुसार विनोदस्थानों पर बैठिए । राजा:-- वेत्रवति, मेरे आदेशानुसार मन्त्री आर्य पिशुन से कहो कि आज देर से (सोकर) उठने के कारण मेरा धर्मासन (न्यायासन) पर बैठना सम्भव नहीं है । आर्य (आप) के द्वारा जो नागरिको का कार्य देख लिया गया हो, उसे पत्र पर चढ़ाकर (मेरे पास) भेज दें । प्रतिहारी:-- जो महाराज आज्ञा देते हैं । (निकल जाता है) । राजा:-- वातायन, तुम भी अपना कार्य (नियोग) पूरा (अशुन्य) करो । कञ्चुकी:-- जो आप की आज्ञा । (निकल जाता है) । विदूषक:-- आप के द्वारा (यह स्थान) एकान्त (निर्जन) कर दिया गया । अब शीत और धूप से रहित इस रमणीय प्रमदवन के प्रदेश में अपना मनोरंजन कीजिये । राजा:-- हे मित्र, जो कहा जाता है कि विपत्तियाँ (अनर्थ) छिद्र (विपत्ति) पर ही टूट पड़ती है, वह बिल्कुल सत्य (अव्यभिचारी) वचन है । क्योकि हे मित्र, मुनि (कण्व) की पुत्री (शकुन्तला) के प्रति प्रणय (प्रेम) के स्मरण के अज्ञान (मोह) के द्वारा यह मन मुक्त कर दिया गया है, और प्रहार करने वाले कामदेव के द्वारा धनुष पर आम्र-मञ्जरी रूपी बाण भी चढ़ा लिया गया है । (अर्थात्‌ अब मेरा हृदय मोह-अनज्ञान से रहित हो गया है जिससे शकुन्तला के प्रणय की घटना याद आ गयी है) । पर इधर कामदेव भी मेरे ऊपर प्रहार करने के लिये उद्यत हो गया है ।
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