सानुमती:--
उस बेचारी (शकुन्तला) के भाग्य ही ऐसे हैं ।
विदूषक:--
(एक ओर मुंह करके) यह फिर शकुन्तला के रोग से आक्रान्त (ग्रस्त) हो गये । न जाने कैसे इनकी चिकित्सा होगी ?
कञ्चुकी:--
(समीप में जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । महाराज प्रमदवन के स्थान (मेरे द्वारा) भली-भाँति देख लिये गये हैं । महाराज, (अब आप) इच्छानुसार विनोदस्थानों पर बैठिए ।
राजा:--
वेत्रवति, मेरे आदेशानुसार मन्त्री आर्य पिशुन से कहो कि आज देर से (सोकर) उठने के कारण मेरा धर्मासन (न्यायासन) पर बैठना सम्भव नहीं है । आर्य (आप) के द्वारा जो नागरिको का कार्य देख लिया गया हो, उसे पत्र पर चढ़ाकर (मेरे पास) भेज दें ।
प्रतिहारी:--
जो महाराज आज्ञा देते हैं । (निकल जाता है) ।
राजा:--
वातायन, तुम भी अपना कार्य (नियोग) पूरा (अशुन्य) करो ।
कञ्चुकी:--
जो आप की आज्ञा । (निकल जाता है) ।
विदूषक:--
आप के द्वारा (यह स्थान) एकान्त (निर्जन) कर दिया गया । अब शीत और धूप से रहित इस रमणीय प्रमदवन के प्रदेश में अपना मनोरंजन कीजिये ।
राजा:--
हे मित्र, जो कहा जाता है कि विपत्तियाँ (अनर्थ) छिद्र (विपत्ति) पर ही टूट पड़ती है, वह बिल्कुल सत्य (अव्यभिचारी) वचन है । क्योकि हे मित्र, मुनि (कण्व) की पुत्री (शकुन्तला) के प्रति प्रणय (प्रेम) के स्मरण के अज्ञान (मोह) के द्वारा यह मन मुक्त कर दिया गया है, और प्रहार करने वाले कामदेव के द्वारा धनुष पर आम्र-मञ्जरी रूपी बाण भी चढ़ा लिया गया है । (अर्थात् अब मेरा हृदय मोह-अनज्ञान से रहित हो गया है जिससे शकुन्तला के प्रणय की घटना याद आ गयी है) । पर इधर कामदेव भी मेरे ऊपर प्रहार करने के लिये उद्यत हो गया है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।