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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 10
सानुमती- अहोः, इदृशी स्वकार्यपरता । अस्य सन्तापेनाहं रमे । विदूषकः-- भोः, अस्ति मे तर्कः केनापि तत्रभवत्याकाशचारिणा नीतेति । राजा- कः पतिदेवतामन्यः परामर्टुमुत्सहेत ? मेनका किल सख्यास्ते जन्मप्रतिष्ठेति श्रुतवानस्मि । तत्सहचारिणीभिः सखी ते हृतेति मे हृदयमाशङ्कते । सानुमती- सम्मोहः खलु विस्मयनीयो न प्रतिबोधः । विदूषकः- यद्येवमस्ति खलु समागमः कालेन तत्र भवत्या । राजा--कथमिव ? विदूषकः- न खलु मातापितरो भर्वृवियोगदुःखितां दुहितरं चिरं द्रष्टु पारयतः । राजा-- वयस्य, स्वप्नो नु माया नु मतिभ्रमो नु क्लिष्टं नु तावत्फलमेव पुण्यम्‌ । असन्निवृत्ये तदतीतमेते मनोरथा नाम तटप्रपाताः।।
सानुमती:-- अहो, ऐसी ही स्वार्थपरता (होती है कि) इस (राजा दुष्यन्त) के दुःख से मैं प्रसन्न हो रही हूँ । विदूषक:-- हे मित्र, मेरा अनुमान है कि आकाशचारी (प्राणी) के द्वारा मान्य (शकुन्तला) ले जायी गयी है (अर्थात्‌ उस आदरणीय को कोई आकाश में विचरण करने वाला (देवता) उठा ले गया है) । राजा:-- उस पतिव्रता को कौन दूसरा स्पर्श करने का साहस कर सकता है । मेने ऐसा सुना है कि मेनका तुम्हारी सखी (शकुन्तला) की जननी (जन्म देने वाली) है । उसकी सखियों के द्वारा तुम्हारी सखी (शकुन्तला) ले जायी गयी है (अर्थात्‌ उसकी सखियां तुम्हारी सखी शकुन्तला को ले गयी हैं) ऐसी मेरी हदय की आशङ्का है । सानुमती:-- (राजा का शकुन्तला को) भूलना (सम्मोह) ही आश्चर्य की बात है, स्मरण करना (आश्चर्य की बात) नहीं है । विदूषक:-- यदि ऐसा है तो निश्चित ही समय आने पर मान्य (शकुन्तला) से (आप का) मिलन होगा । राजा:-- कैसे ? विदूषक:-- वस्तुतः माता-पिता पति के वियोग से दुःखित पुत्री को अधिक समय तक नहीं देख सकते । राजा:-- हे मित्र, वह (शकुन्तला का मिलन) क्या स्वप्न था ? क्या वह माया थी ? क्या वह मेरी बुद्धि का भ्रम था ? अथवा क्या उतने ही फल वाला (मेरा) स्वल्प पुण्य था ? वह (शकुन्तला का मिलन) फिर कभी न लौटने के लिये चला गया । ये (मेरे) मनोरथ (नदी के) तट (किनारे) के पतन के समान है, (जो गिरकर फिर कभी नहीं उठते) ।
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