विदूषक:--
ऐसा न (कहिये) वस्तुतः यह अँगूठी ही उदाहरण (प्रमाण) है कि अवश्यम्भावी (अवश्य होने वाला) मिलन अचानक होता है ।
राजा:--
(अँगूठी को देखकर) अरे, यह तो दुर्लभ स्थान से गिर जाने वाली (अँगूठी) शोचनीय हो गयी है । हे अँगूठी, तुम्हारा पुण्य मेरे (पुण्य के) समान निश्चय ही स्वल्प (न्यून) है, (यह) परिणाम (फल) के द्वारा ही ज्ञात हो रहा है । जो कि उस (शकुन्तला) की लाल नाखूनों से मनोहर उंगलियों में स्थान प्राप्त कर (भी) तुम गिर गयी (च्युत हो गयी) हो ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।