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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 11
विदूषकः-- मेवम्‌ । नन्वङ्कुलीकमेव निदर्शनमवश्यम्भाव्यचिन्तनीयः समागमो भवतीति । राजा- (अङ्गुलीयकं विलोक्य) अये, इदं तावदसुलभस्थानभ्रशि शोचनीयम्‌ । तव॒ सुचरितमङ्गुलीय नूनं प्रतनु ममेव विभाव्यते फलेन । अरुणनखमनोहरासु तस्याश्च्युतासि लब्धपदं यदङ्गलीषु ।।
विदूषक:-- ऐसा न (कहिये) वस्तुतः यह अँगूठी ही उदाहरण (प्रमाण) है कि अवश्यम्भावी (अवश्य होने वाला) मिलन अचानक होता है । राजा:-- (अँगूठी को देखकर) अरे, यह तो दुर्लभ स्थान से गिर जाने वाली (अँगूठी) शोचनीय हो गयी है । हे अँगूठी, तुम्हारा पुण्य मेरे (पुण्य के) समान निश्चय ही स्वल्प (न्यून) है, (यह) परिणाम (फल) के द्वारा ही ज्ञात हो रहा है । जो कि उस (शकुन्तला) की लाल नाखूनों से मनोहर उंगलियों में स्थान प्राप्त कर (भी) तुम गिर गयी (च्युत हो गयी) हो ।
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