विदूषकः -(आत्मगतम्) कथं बुभुक्षया खादितव्योऽस्मि ।
राजा-प्रिये, अकारणपरित्यागानुशयतप्तहदयस्तावदनुकम्प्यतामयं जनः पुनर्दशनेन ।
(प्रविश्यापदीक्षेपेण चित्रफलकहस्ता)
चतुरिका--इयं चित्रगता भटनी । (इति चित्रफलकं दर्शयति) ।
विदूषकः-(विलोक्य) साधु वयस्य । मधुरावस्थानदर्शनीयो भावानुप्रवेशः स्खलतीव मे दृष्टिर्निम्नोन्नतप्रदेशेषु ।
सानुमती- अहो, एषा राजघेर्निपुणता । जाने सख्यग्रतो मे वर्तत इति ।
राजा-यद्यत् साधु न चित्रे स्यात् क्रियते तत्तदन्यथा । तथापि तस्या लावण्यं रेखया किञ्चिदन्वितम् ।।
विदूषक:--
(अपने मन में) क्या मैं भूख के द्वारा खा लिया जाऊंगा (अर्थात् मुझे भूख बहुत अधिक सता रही है) ।
राजा:--
प्रिये, बिना कारण (तुम्हारे) परित्याग के कारण पश्चात्ताप (अनुशय) से सन्तप्त हृदय वाले इस व्यक्ति (मुझ दुष्यन्त) को फिर से दर्शन देकर अनुगृहीत (कृतार्थ) करो ।
(चित्रपट हाथ में ली हुई पर्दा हटाने के साथ प्रवेश कर)
चतुरिका:--
यह चित्रलिखित (चित्र में बनायी गयी) स्वामिनी (शकुन्तला) हैं । (चित्रपट को दिखाती है) ।
विदूषक:--
(देखकर) मित्र, (बहुत) सुन्दर है । भावों की अभिव्यक्ति सुन्दर (अवयव के) विन्यास (अवस्थान) के कारण दर्शनीय है । मेरी दृष्टि ऊँचे-नीचे स्थानों पर मानो लड़खडा रही (फिसल जा रही) है ।
सानुमती:--
ओह, यह है राजर्षि (दुष्यन्त) (के चित्र बनाने) की निपुणता । लगता है कि (मेरी) सखी (शकुन्तला) मेरे सम्मुख विद्यमान है ।
राजा:--
चित्र में जो-जो सुन्दर नहीं है (अर्थात् त्रुटिपूर्ण है) वह सब (मेरे द्वारा) ठीक किया जा रहा है (अर्थात् उसको मैं अभी ठीक कर रहा हूँ) । फिर भी उस (शकुन्तला) का सौन्दर्य रेखाओं के द्वारा कुछ ही प्रकट हो पाया है ।
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