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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 19
विदूषकः-- भोः, किं नु तत्रभवती रक्तकुवलयपल्लवशशोभिनाऽ प्रहस्तेन मुखमावार्य - अकितचकितेवं स्थिता । राजा-- चतु वार्यतामेष धृष्टः । विदूषकः--भवानेवाविनीतानां शासितांस्य वारणे प्रभविष्यति । राजा-- युज्यते । अयि भोः कुसुमलताप्रियातिथे, किमत्र परिपतनखेदमनुभवसि ? एषा कुसुमनिषण्णा तृषितापि सती - भवन्तमनुरक्ता । प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु विना त्वया पिबति ।। नुमत्ती- अद्याभिजातं खल्येषवारितः । विदूषकः-- प्रतिषिद्धाऽपि वोमैषा जातिः । राजा--एवं भोः, न मे-शासने तिष्ठसि 2 श्रुयतां तर्हि सम्प्रति-- अक््लिष्टबालतरुपल्लवलोभनीयं पीतं - मया सदयमेव रतोत्सवेषु । बिम्बाधरं स्पृषटासि चेद्‌ भ्रमर प्रियायास्त्वा कारयामि कमलोदरबन्धनस्थम्‌ ।।
विदूषकः:-- हे (मित्र), आदरणीय (शकुन्लता) लाल कमल के नये पत्ते के समान सुशोभित हाथ के अगले भाग (अर्थात्‌ उंगलियों) से मुख को ठककर अत्यन्त भयभीत सी खड़ी हैं । (सावधानी से विचार कर और देखकर) ओह, यह नीच (दासी का बेटा) पुष्प के रस को चुराने वाला भ्रमर मान्य (शकुन्तला) के मुखकमल पर आक्रमण कर रहा (मंडरा रहा) है । राजा:-- तो यह ढीठ (भ्रमर) रोका (हटाया) जाय (अर्थात्‌ इस ढीठ भौंरे को हटाओ) । विदूषक:-- दुष्टो के शासक (दण्ड देने वाले) आप ही इसके निवारण (अर्थात्‌ इसको हटाने) में समर्थ होंगे । राजा:-- ठीक है । अरे हे पुष्पलता के प्रिय अतिथि, तुम क्यों यह (शकुन्तला के मुखमण्डल के चारो ओर) चक्कर काटने (अर्थात्‌ मंडराने) का कष्ट उठा रहे हो ? (तुम पर) अनुरक्त यह भ्रमरी प्यासी होकर पुष्प पर बैठी हुई भी (तुम्हारी) प्रतीक्षा कर रही है । तुम्हारे बिना पुष्परस को (भी) नहीं पी रही है । सानुमती:-- आज (इस दशा में) (राजा द्वारा) यह (भ्रमर) अत्यन्त शिष्ट (अच्छे) ढंग से रोका गया है। विदूषक:-- यह (भ्रमर) जाति रोकी जाने पर भी विपरीत (उल्टा) कार्य करने वाली (होती है) । राजा:-- क्यो रे, तू मेरे आदेश (शासन) में नहीं है (अर्थात्‌ मेरी आज्ञा नहीं मानता है) ? तो अब तु सुन ले - हे भ्रमर, न मुरझाए हुए (अथवा किसी के द्वारा स्पर्श न किये गये) नवीन तरुपल्लव के सामन लुभावने (मनोहर) तथा मेरे द्वारा रतिकाल में (भी) दयापूर्वक पान किये गये (मेरी) प्रिय (शकुन्तला) के बिम्बफल के समान (लाल) अधर को यदि तुम छूओगे (तो) तुमको कमल के मध्य-भाग रूपी कारागार में स्थित (बन्द) करा दूंगा ।
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