विदूषकः:--
हे (मित्र), आदरणीय (शकुन्लता) लाल कमल के नये पत्ते के समान सुशोभित हाथ के अगले भाग (अर्थात् उंगलियों) से मुख को ठककर अत्यन्त भयभीत सी खड़ी हैं । (सावधानी से विचार कर और देखकर) ओह, यह नीच (दासी का बेटा) पुष्प के रस को चुराने वाला भ्रमर मान्य (शकुन्तला) के मुखकमल पर आक्रमण कर रहा (मंडरा रहा) है ।
राजा:--
तो यह ढीठ (भ्रमर) रोका (हटाया) जाय (अर्थात् इस ढीठ भौंरे को हटाओ) ।
विदूषक:--
दुष्टो के शासक (दण्ड देने वाले) आप ही इसके निवारण (अर्थात् इसको हटाने) में समर्थ होंगे ।
राजा:--
ठीक है । अरे हे पुष्पलता के प्रिय अतिथि, तुम क्यों यह (शकुन्तला के मुखमण्डल के चारो ओर) चक्कर काटने (अर्थात् मंडराने) का कष्ट उठा रहे हो ? (तुम पर) अनुरक्त यह भ्रमरी प्यासी होकर पुष्प पर बैठी हुई भी (तुम्हारी) प्रतीक्षा कर रही है । तुम्हारे बिना पुष्परस को (भी) नहीं पी रही है ।
सानुमती:--
आज (इस दशा में) (राजा द्वारा) यह (भ्रमर) अत्यन्त शिष्ट (अच्छे) ढंग से रोका गया है।
विदूषक:--
यह (भ्रमर) जाति रोकी जाने पर भी विपरीत (उल्टा) कार्य करने वाली (होती है) ।
राजा:--
क्यो रे, तू मेरे आदेश (शासन) में नहीं है (अर्थात् मेरी आज्ञा नहीं मानता है) ? तो अब तु सुन ले - हे भ्रमर, न मुरझाए हुए (अथवा किसी के द्वारा स्पर्श न किये गये) नवीन तरुपल्लव के सामन लुभावने (मनोहर) तथा मेरे द्वारा रतिकाल में (भी) दयापूर्वक पान किये गये (मेरी) प्रिय (शकुन्तला) के बिम्बफल के समान (लाल) अधर को यदि तुम छूओगे (तो) तुमको कमल के मध्य-भाग रूपी कारागार में स्थित (बन्द) करा दूंगा ।
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