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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 7
सानुमती- (राजानं दृष्टवा) स्थाने खलु प्रत्यादेशविमानिताऽप्यस्य कृते शकुन्तला क्लाम्यतीति । राजा--(ध्यानमन्द्‌ परिक्रम्य) प्रथमं सारङ्गाक्ष्या प्रियया प्रतिबोध्यमानमपि सुप्तम्‌ । अनुशपदुःखाययेदं हतहृदयं सम्प्रति विबुद्धम्‌ ।।
सानुमती:-- (राजा को देखकर) परित्याग के द्वारा अपमानित हुई भी शकुन्तला इस (राजा दुष्यन्त) के लिये दुःखित रहती है, यह ठीक ही है । राजा:-- (ध्यान-मग्न धीरे-धीरे चारो ओर घूमकर) पहले मृगनयनी प्रिय (शकुन्तला) के द्वारा जगाया जाता हुआ (याद दिलाया जाता हुआ) भी सोया हुआ (विस्मृतिग्रस्त) यह अभागा हृदय अब पश्चाताप दुःख (भोगने) के लिये जाग गया (होश में आया) है ।
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