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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 17
विदूषक-(आत्मगतम्‌) एषोऽत्रभवान्‌ नदीमतिक्रम्य मृगतृष्णिकां सङ्क्रान्तः । (प्रकाशम्‌) भोः, अपरं किमत्र लेखितव्यम्‌ ? सानुमती--यो यः प्रदेशः सख्या मेऽभिरूपस्तं तमालेखितुकोमो भवेत्‌ । राजा--श्रूयताम्‌-- कार्या सैकतलीनहसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी पादास्तामभितो निषण्णहरिणा गौरीगुरोः पावनाः । शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्मिमतुमिच्छाम्यधः शुद्धे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्‌ ।।
विदषक:-- (अपने मन में) ये महानुभाव (महाराज) नदी को लांघकर मृगतृष्णा में प्रविष्ट हो गये हैं । (प्रकट रूप में) हे (मित्र), यहाँ (इस चित्र में) और क्या लिखना (बनाना) है ? सानुमती:-- जो-जो स्थान मेरी सखी (शकुन्तला) को प्रिय (अभिरूप) हैं, उन सबको चित्रित करने के इच्छुक होंगे । राजा:-- सुनो ! जिसके रेतीले (बालुकामय) तट पर हंसयुगल (हंसो का जोड़ा) बैठा हुआ है ऐसी मालिनी नदी चित्रित करनी (बनानी) है । उसके दोनों ओर (पार्वती के पिता) हिमालय की (ऐसी) पवित्र पहाड़ियां (बनानी हैं), जिनपर हरिण बैठे हुये हैं । जिसकी शाखाओं (डालियों) पर (सूखने के लिये) वल्कल-वस्त्र लटक रहे हैं ऐसे वृक्ष के नीचे काले हरिण के सींग पर (अपनी) बाई आंख को खुजलाती हुई हरिणी को बनाने की इच्छा करता हूँ (बनाना चाहता हूँ) ।
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