मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 9
विदूषकः-- तिष्ठ तावत्‌ । अनेन दण्डकाष्ठेन कन्दर्पबाणं नाशयिष्यामि । राजा- (सस्मितम्‌) भवतु । दृष्टं ब्रह्मवर्चसम्‌ । सखे, क्वोपविष्टः प्रियाया किञ्चिदनुकारिणीषु लतासु दृष्टिं विलोभयामि । विदूषकः- नन्वासन्नपरिचारिका चतुरिका भवता सन्दिष्टा । माधवीमण्डप इमां वेलामतिवाहयिष्ये । तत्र मे चित्रफलकगतां स्वहस्तलिखितां तत्रभवत्याः ` शकुन्तलायाः प्रतिकृतिमानयेति । राजा--इदृशं हदयविनोदस्थानम्‌ । तत्तमेव मार्गमादेशय । विदूषक--इत इतो भवान्‌ । (उभौ परिक्रामतः । सानुमत्यमनुगच्छति) विदूषकः--एष मणिशिलापडकसनाथो माधवीमण्डप उपहाररमणीयतया निः संशयं स्वागतेनेव नौ प्रतीच्छति । तत्‌ प्रविश्य निषीदतु भवान्‌ । (उभौ प्रवेशं कृत्वोपविष्टौ) सानुमती-लतासंश्चिता द्रक्ष्यामि तावत्‌ सख्याः प्रतिकृतिम्‌ । ततोऽस्या भर्तुर्बहुमुखमनुरागं निवेदयिष्यामि । राजा- सखे, सर्वमिदानीं स्मरामि शकुन्तलायाः प्रथमवृत्तान्तम्‌ । कथितवानस्मि भवते च । स भवान्‌ प्रत्यादेशवेलायां मत्समीपगतो नासीत्‌ । पूर्वमपि न त्वया कदाचित्‌ सङ्कीर्तितं तत्रभवत्या नाम । कञ्चिदहमिव विस्मृतवानसि त्वम्‌ । विदूषकः- न विस्मरामि । किन्तु सर्व कथयित्वाऽ वसाने पुनस्त्वया हरिहासविजल्प एष न भूतार्थ इत्याख्यातम्‌ । मयाऽपि मृत्पिण्डबुद्धिना तथैव गृहीतम्‌ । अथवा भवितव्यता खलु बलवती । सानुमती- एवमेवैतत्‌ (एव्वं णेद) । राजा-(ध्यात्वा) सखे, त्रायस्व माम्‌ । विदूषकः-- भोः किमेतत्‌ ? अनुपपन्नं खल्वीदृशं त्वयि । कदापि सत्पुरुषाः शोकवास्तव्या न भवन्ति । ननु प्रवातेऽपि निष्कम्पा गिरयः । राजा-बयस्य, निराकरणविक्लवायाः प्रियायाः समवस्थामनुस्मृत्य बलवदशरणोऽस्मि । सा हि-- इतः प्रत्यादेशात्‌ स्वजनमनुगन्तुं व्यवसिता स्थिता तिष्ठेत्युच्चैर्वदति गुरुशिष्ये गुरुसमे । पुनर्दृष्टिं बाष्यप्रसरकलुषामर्पितवती मयि क्रूरे यत्तत्‌ सविषमिव शल्यं दहति माम्‌ ।।
विदूषक:-- तो रुकिये । इस काठ के दण्ड से कामदेव के बाण को नष्ट कर देता हूँ । (काठ के डण्डे को उठाकर आम्र-मञ्जरी को गिराना चाहता है ) राजा:-- (मुस्कराहट के साथ) अच्छा, (तुम्हारा) ब्रह्मतेज देख लिया गया । हे मित्र, कहाँ बैठकर मैं अपनी प्रिय (शकुन्तला) का कुछ-कुछ अनुकरण करने वाली लताओं पर (अर्थात्‌ लताओं `को देखकर) अपनी दृष्टि को आनन्दित करुँ (बहलाऊँ) । विदूषक:-- आपने समीपवर्ती सेविका चतुरिका को आदेश किया है कि "माधवी लता के कुञ्च (मण्डप) में इस समय को बिताऊंगा । वहाँ मेरे अपने हाथ द्वारा चित्रपट पर बनाये गये मान्य शकुन्तला के चित्र को लाओ" । राजा:-- ऐसा मन बहलाने का स्थान है, तो उसी मार्ग को बताओ । विदूषक:-- आप इधर से, इधर से (आइये) । (दोनो चारो ओर घूमते हैं । सानुमती उनके पीछे-पीरे जाती है) विदूषक:-- यह मणिमय शिलापट्ट से युक्त माधवीकुञ् (पुष्पों के) उपहारो से रमणीय होने के कारण निःसन्देह मानो स्वागतपूर्वक हम दोनों को अमंत्रित करा रहा है (अर्थात्‌ हम दोनों को बुला रहा है) तो प्रवेश करके आप बैठिये । (दोनों प्रवेश कर बैठ जाते हैं) सानुमती:-- तब तक लता का आश्रय (ओट) लेकर सखी (शकुन्तला) के चित्र को देखती हूँ । तत्पश्चात्‌ इस (शकुन्तला) के पति (दुष्यन्त) के बहुमुखी (विविध प्रकार से प्रकट किये हुये) अनुराग को मैं उससे (शकुन्तला से) कहूंगी । (वैसा कर अर्थात्‌ लता में छिपकर खड़ी हो जाती है ) राजा:-- हे मित्र, अब शकुन्तला से सम्बद्ध पहले के सभी वृत्तान्त (घटना) को याद कर रहा हूँ । आप को मैंने (उसी समय) कहा (बताया) भी था । वह आप (उस शकुन्तला के) परित्याग के समय मेरे पास नहीं थे । (किन्तु) पहले भी आप के द्वारा उस (शकुन्तला) का नाम नहीं लिया गया (अर्थात्‌ आप ने याद नहीं दिलाया) । क्या तुम भी मेरी तरह भूल गये थे ? विदूषक:-- मैं नहीं भूलता । किन्तु सब कुछ कहकर अन्त में फिर आप ने कहा था कि - "यह सब हंसी की बात है, सत्य नही" । मिट्टी के लोदे के समान मन्द बुद्धि वाले मैंने भी उसी प्रकार (हंसी में कहा गया कथन) ही समझ लिया । अथवा भावी (होनवार) बलवान्‌ होती है । सानुमती:-- यह ऐसा (ही है) । राजा:-- (ध्यान करके) हे मित्र, मुझको बचाओ । विदूषक:-- अरे, यह क्या ? आप के विषय में निश्चय ही यह अनुचित है । सज्जन व्यक्ति कभी भी शोक के वशीभूत नहीं होते हैं । निश्चय ही ओंधी में भी पर्वत नहीं कांपते (अर्थात्‌ नहीं हिलते - अडिग रहते हैं) । राजा:-- हे मित्र, परित्याग से व्याकुल प्रियतम (शकुन्तला) की (तत्कालीन) दशा को याद कर मैं अत्यधिक असहाय (अधीर) हो गया हूँ । क्योकि वह यहाँ से (अर्थात्‌ मेरे द्वारा) अस्वीकार हो जाने के कारण अपने बान्धवो के पीछ-पीछे जाने के लिये प्रवृत्त हुयी (अर्थात्‌ अपने साथ आये हुये व्यक्तियों के पीछे-पीछे चलने लगी) । गुरु (पिता) के समान गुरुशिष्य (शार्खगरव) के "(यहीं) रुको" इस प्रकार जोर से (डांटकर) कहने पर खड़ी हो गयी (रुक गयी) । आंसुओं के प्रवाह से मलिन दृष्टि को फिर मुझ कठोर (क्रूर) पर जो डाली, वह (सारा दृश्य) विषयुक्त (विष से बुझे हुए) बाण की भाँती मुझको जला रहा है (अर्थात्‌ दुःखित कर रहा है) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें