विदूषक:--
तो रुकिये । इस काठ के दण्ड से कामदेव के बाण को नष्ट कर देता हूँ । (काठ के डण्डे को उठाकर आम्र-मञ्जरी को गिराना चाहता है )
राजा:--
(मुस्कराहट के साथ) अच्छा, (तुम्हारा) ब्रह्मतेज देख लिया गया । हे मित्र, कहाँ बैठकर मैं अपनी प्रिय (शकुन्तला) का कुछ-कुछ अनुकरण करने वाली लताओं पर (अर्थात् लताओं `को देखकर) अपनी दृष्टि को आनन्दित करुँ (बहलाऊँ) ।
विदूषक:--
आपने समीपवर्ती सेविका चतुरिका को आदेश किया है कि "माधवी लता के कुञ्च (मण्डप) में इस समय को बिताऊंगा । वहाँ मेरे अपने हाथ द्वारा चित्रपट पर बनाये गये मान्य शकुन्तला के चित्र को लाओ" ।
राजा:--
ऐसा मन बहलाने का स्थान है, तो उसी मार्ग को बताओ ।
विदूषक:--
आप इधर से, इधर से (आइये) ।
(दोनो चारो ओर घूमते हैं । सानुमती उनके पीछे-पीरे जाती है)
विदूषक:--
यह मणिमय शिलापट्ट से युक्त माधवीकुञ् (पुष्पों के) उपहारो से रमणीय होने के कारण निःसन्देह मानो स्वागतपूर्वक हम दोनों को अमंत्रित करा रहा है (अर्थात् हम दोनों को बुला रहा है) तो प्रवेश करके आप बैठिये ।
(दोनों प्रवेश कर बैठ जाते हैं)
सानुमती:--
तब तक लता का आश्रय (ओट) लेकर सखी (शकुन्तला) के चित्र को देखती हूँ । तत्पश्चात् इस (शकुन्तला) के पति (दुष्यन्त) के बहुमुखी (विविध प्रकार से प्रकट किये हुये) अनुराग को मैं उससे (शकुन्तला से) कहूंगी । (वैसा कर अर्थात् लता में छिपकर खड़ी हो जाती है )
राजा:--
हे मित्र, अब शकुन्तला से सम्बद्ध पहले के सभी वृत्तान्त (घटना) को याद कर रहा हूँ । आप को मैंने (उसी समय) कहा (बताया) भी था । वह आप (उस शकुन्तला के) परित्याग के समय मेरे पास नहीं थे । (किन्तु) पहले भी आप के द्वारा उस (शकुन्तला) का नाम नहीं लिया गया (अर्थात् आप ने याद नहीं दिलाया) । क्या तुम भी मेरी तरह भूल गये थे ?
विदूषक:--
मैं नहीं भूलता । किन्तु सब कुछ कहकर अन्त में फिर आप ने कहा था कि - "यह सब हंसी की बात है, सत्य नही" । मिट्टी के लोदे के समान मन्द बुद्धि वाले मैंने भी उसी प्रकार (हंसी में कहा गया कथन) ही समझ लिया । अथवा भावी (होनवार) बलवान् होती है ।
सानुमती:-- यह ऐसा (ही है) ।
राजा:--
(ध्यान करके) हे मित्र, मुझको बचाओ ।
विदूषक:--
अरे, यह क्या ? आप के विषय में निश्चय ही यह अनुचित है । सज्जन व्यक्ति कभी भी शोक के वशीभूत नहीं होते हैं । निश्चय ही ओंधी में भी पर्वत नहीं कांपते (अर्थात् नहीं हिलते - अडिग रहते हैं) ।
राजा:--
हे मित्र, परित्याग से व्याकुल प्रियतम (शकुन्तला) की (तत्कालीन) दशा को याद कर मैं अत्यधिक असहाय (अधीर) हो गया हूँ । क्योकि वह यहाँ से (अर्थात् मेरे द्वारा) अस्वीकार हो जाने के कारण अपने बान्धवो के पीछ-पीछे जाने के लिये प्रवृत्त हुयी (अर्थात् अपने साथ आये हुये व्यक्तियों के पीछे-पीछे चलने लगी) । गुरु (पिता) के समान गुरुशिष्य (शार्खगरव) के "(यहीं) रुको" इस प्रकार जोर से (डांटकर) कहने पर खड़ी हो गयी (रुक गयी) । आंसुओं के प्रवाह से मलिन दृष्टि को फिर मुझ कठोर (क्रूर) पर जो डाली, वह (सारा दृश्य) विषयुक्त (विष से बुझे हुए) बाण की भाँती मुझको जला रहा है (अर्थात् दुःखित कर रहा है) ।
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