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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 20
विदूषकः--एवं तीश्णदण्डस्य कि न भेष्यति ? (प्रहस्य । आत्मगतम्‌) एष तावदुन्मतः । अहमप्येतस्य सङ्गेनेदृशवर्ण इव संवृत्तः (प्रकाशम्‌) भोः चित्रं खल्वेतत्‌ । राजा--कथं चित्रम्‌ ? सानुमती-अहमपीदानीमवगतार्था । कि पुनर्यथालिखितानुभाव्येषः । राजा-- वयस्य, किमिदमनुष्ठितं पौरोभाग्यम्‌ ? दरश्नसुखमनु भवतः साक्षादिव तन्मयेन हदयेन । स्मृतिकारिणा त्वया मे पुनरपि चित्रीकृता कान्ता ।।
विदूषक:-- इस प्रकार कठोर दण्ड देने वाले (आप) से (यह) क्यों नहीं डरेगा। (हंसकर, अपने मन में) यह (राजा) तो पागल (उन्मत) हो गया है । मैं भी इस (राजा) की संगति के कारण इसी प्रकार का (अर्थात्‌ पागल जैसा) हो गया हूँ । (प्रकट रूप में) हे (मित्र), यह तो चित्र है (वास्तविक दृश्य नहीं है) । राजा:-- क्या (यह) चित्र है ? सानुमती:-- मैं भी यथार्थ को अब समझ पायी हूँ (कि यह चित्र है) । फिर चित्र के अनुसार अनुभव करने वाले इस राजा का क्या कहना । राजा:-- हे मित्र, तुमने क्या धृष्टता (ढिठायी) कर दी ? तन्मय हृदय से मानो (प्रिय के) साक्षात्‌ दर्शन सुख का अनुभव करने वाले मुझको, (यह चित्र है ऐसा) स्मरण करा देने वाले तुम्हारे द्वारा (मेरी) प्रिय (शकुन्तला) फिर से चित्र बना दी गयी है (आंसुओं को बहाता है) ।
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