विदूषक:--
इस प्रकार कठोर दण्ड देने वाले (आप) से (यह) क्यों नहीं डरेगा। (हंसकर, अपने मन में) यह (राजा) तो पागल (उन्मत) हो गया है । मैं भी इस (राजा) की संगति के कारण इसी प्रकार का (अर्थात् पागल जैसा) हो गया हूँ । (प्रकट रूप में) हे (मित्र), यह तो चित्र है (वास्तविक दृश्य नहीं है) ।
राजा:--
क्या (यह) चित्र है ?
सानुमती:--
मैं भी यथार्थ को अब समझ पायी हूँ (कि यह चित्र है) । फिर चित्र के अनुसार अनुभव करने वाले इस राजा का क्या कहना ।
राजा:--
हे मित्र, तुमने क्या धृष्टता (ढिठायी) कर दी ? तन्मय हृदय से मानो (प्रिय के) साक्षात् दर्शन सुख का अनुभव करने वाले मुझको, (यह चित्र है ऐसा) स्मरण करा देने वाले तुम्हारे द्वारा (मेरी) प्रिय (शकुन्तला) फिर से चित्र बना दी गयी है (आंसुओं को बहाता है) ।
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