सानुमती:--
अब तुम्हारी वंशपरम्परा (सन्तति) अविच्छिन्न (अटूट) रहेगी ।
चतुरिका:--
(हाथ की ओट में) अरे, इस प्रमुख व्यापारी (धनमित्र) के वृत्तान्त से स्वामी दूनी व्याकुलता वाले हो गये हैं । इनको आश्वासन देने के लिये "मेघप्रतिच्छन्द" (नामक भवन) से आर्य माधव्य को लेकर आओ ।
प्रतीहारी:--
तुम ठीक कहती हो । (निकल जाती है) ।
राजा:--
ओह, दुष्यन्त के (अर्थात् मेरे) पितृगण संशय में पड़ गये हैं । क्योकि खेद है कि "इस (दुष्यन्त) के बाद हमारे वंश में वेद्विहित विधि के अनुसार तैयार किये गये श्राद्ध-तर्पण को कौन देगा" इस प्रकार (सोचकर) निश्चय ही (मेरे) पित्रगण (पितर् लोग) निःसन्तान मेरे द्वारा दिये गये जल (के उस भाग) को पीते हैं, जो उनके आंसुओं के धोने से अवशिष्ट होता है । (मूर्छित हो जाता है) ।
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