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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 24
सानुमती--अपरिच्छिन्नेदानीं ते सन्ततिर्भविष्यति । चतुरिका- (जनान्तिकम्‌) अये, अनेन सार्थवाहवृत्तान्तेन द्िगुणोदेगी भर्ता । एनामाश्चसयितु मेघप्रतिच्छन्दादार्थ माधव्यं गृहीत्वागच्छ । प्रतीहारी- सुष्ठु भणसि । (इति निक्क्रान्ता) । राजा-अहो, दुष्यन्तस्य संशयमारूढाः पिण्डभाजः । कुतः-- अस्मात्रं बत यथाश्रुति सम्भृतानि को नैः कुले निवपनानि नियच्छतीति । नून प्रसूतिविकलेन मया प्रसिक्त धौताश्रुशेषमुदकं पितरः पिबन्ति ।।
सानुमती:-- अब तुम्हारी वंशपरम्परा (सन्तति) अविच्छिन्न (अटूट) रहेगी । चतुरिका:-- (हाथ की ओट में) अरे, इस प्रमुख व्यापारी (धनमित्र) के वृत्तान्त से स्वामी दूनी व्याकुलता वाले हो गये हैं । इनको आश्वासन देने के लिये "मेघप्रतिच्छन्द" (नामक भवन) से आर्य माधव्य को लेकर आओ । प्रतीहारी:-- तुम ठीक कहती हो । (निकल जाती है) । राजा:-- ओह, दुष्यन्त के (अर्थात्‌ मेरे) पितृगण संशय में पड़ गये हैं । क्योकि खेद है कि "इस (दुष्यन्त) के बाद हमारे वंश में वेद्विहित विधि के अनुसार तैयार किये गये श्राद्ध-तर्पण को कौन देगा" इस प्रकार (सोचकर) निश्चय ही (मेरे) पित्रगण (पितर्‌ लोग) निःसन्तान मेरे द्वारा दिये गये जल (के उस भाग) को पीते हैं, जो उनके आंसुओं के धोने से अवशिष्ट होता है । (मूर्छित हो जाता है) ।
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