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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 4
(प्रविश्यापटीक्षेपेण कुपितः) कञ्चुकी--मा तावत्‌ अनात्मज्ञे, देवेन प्रतिषिद्धे वसन्तोत्सवे त्वमाप्रकलिकाभङ्खं किमारभसे ? उभे-(भीते) प्रसीदत्वार्यः अगृहीतार्थे आवाम्‌ । कञ्चुको- न किल श्रुतं युवाभ्यां यद्‌ वासन्तिकैस्तरुभिरपि देवस्य शासनं प्रमाणीकृतं तदाश्रयिभिः पत्रिभिश्च । तथाहि-- चूतानां चिरनिर्गताऽपि कलिका वध्नाति न स्वं रजः सन्नद्ध यदपि स्थितं कुरबकं तत्‌ कोरकावस्थया । कण्ठेषु स्खलितं गतेऽपि शिशिरे पुंस्कोकिलानां रुतं शङ्के संहरति स्मरोऽपि, चकितस्तूणार्धकृष्टं शरम्‌ ।।
(पर्दा को हटाकर प्रवेश कर क्रोधपूर्वक) कञ्चुकी:-- अरी, मूर्ख ऐसा मत करो । महाराज द्वारा वसन्तोत्सव मना कर दिये जाने पर (भी) तुम आम की कली को तोड़ना क्यो प्रारम्भ कर रही हो ? दोनो:-- (डरी हुयी) आर्य, प्रसन्न होइये, हम दोनों वह बात नहीं जानती थीं (कि वसन्तोत्सव का निषेध किया गया है) । कञ्चुकी:-- क्या तुम दोनों ने यह नहीं सुना है कि वसन्त में फूलने वाले (वासन्तिक) वृक्षों के द्वारा और उन पर आश्रय लेने वाले (रहने वाले) पक्षियों के द्वारा (भी) महाराज की आज्ञा पालन किया गया है । क्योकि बहुत दिनों से निकली हुयी भी आम की कली अपने पराग को नहीं धारण कर रही है । कुरबक नामक पुष्प, जो कि (खिलने के लिये) तैयार हैं, वह (भी) कली की दशा में (ही) रह गया है । शिशिर (ऋतु) के बीत जाने पर भी नर-कोयलों की कूक (आवाज) (उनके) (गलो) मे (ही) रुकी है । मेरा (अनुमान) है कि कामदेव भी भयभीत होकर (अपने) तरकस से आधे खींचे हुए (निकाले हुए) बाण को रोक रहा है (अर्थात्‌ तरकस में ही रख रहा है) ।
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