राजा:--
(हाथ की ओट में) हे मित्र, स्वर्ग के स्वामी (इंद्र) की आज्ञा अनुलङ्घनीय है । इसलिये इस विषय में अवगत कराकर मेरे आदेशानुसार मंत्री पिशुन से कहना कि अकेली आप की बुद्धि तब तक प्रजा का पूर्णरूप से पालन करे, (जब तक) यह चढ़ी हुई डोरी (परत्यञ्चा) वाला (मेरा) धनुष (राक्षसों के वध रूपी) दूसरे कार्य में लगा हुआ है।
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