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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 15
सानुमती- सदृशमेतत्‌ पश्चा्तापगुरोः स्नेहस्यानवलेपस्य च । विदूषकः-- भोः इदानीं तिख्रस्तत्र भवत्यो दृश्यन्ते । सर्वाश्च दर्शनीयाः । कतमाऽत्र तत्रभवती शकुन्तला ? सानुमती--अनमिभनज्ञः खल्वीदृश्यस्थ रूपस्य मोघदृष्टिरयं जनः । राजा-- त्वं तावत्‌ कतमां तर्कयसि ? विदूषकः- तर्कयामि यैषा-शिथिलबन्धनोद्रान्तकुसुमेन केशान्तेनोद्धिन्नस्वेदबिन्दुना वदनेन विशोषतोऽपसताभ्यां बाहुभ्यामवसेकस्निग्धतरुणपल्लवस्य चूतपादपस्य पार ईषत्परिश्रान्तेवालिखिता सा शकुन्तला । इतरे सख्याविति । राजा-- निपुणो भवान्‌ । अस्त्यत्र मे भावचिहम्‌ । स्विननाङ्गलिविनिवेशो रेखाप्रान्तेषु दृश्यते मलिनः । अश्र च कपोलपतितं दृश्यमिदं वण्किोच्छवासात्‌ ।।
सानुमती:-- पश्चाताप के कारण बढ़े हुये (गुरु) प्रेम और अभिनशुन्यता के अनुरूप ही यह (कथन) है । विदूषक:-- हे (मित्र) (इस चित्रपट में) तीन माननीय युवतियाँ दिखायी दे रहीं हैं । सभी दर्शनीय (सुंदर) हैं । यहाँ (इनमें) श्रीमती शकुन्तला कौन हैं ? सानुमती:-- निष्फल दृष्टि वाला यह व्यक्ति (विदूषक) निश्चय ही इस प्रकार के अनुपम रूप से अनभिज्ञ है । राजा:-- तुम (इनमें से) किसको (शकुन्तला) समझ रहे हो ? विदूषक:-- मैं समझता हूँ कि ढीली चोटी से गिर गये है पुष्प जिसके ऐसे केशपाश वाली उभरी हुई (दिखायी देने वाली) पसीने की बूंदों वाले मुख (तथा) अत्यधिक झुकी हुई भुजाओं से युक्त और सीचने के कारण चिकने नवीन पत्तों वाले आम्र-वृक्ष के समीप कुछ थकी हुई सी जो चित्रित की गयी है, वह शकुन्तला हैं । दूसरी दो सखियाँ हैं । राजा:-- आप (सचमुच) चतुर हो । यहाँ (इस चित्र में) मेरे (सात्विक) भाव का सङ्केत (चिन्ह) है । (चित्र की) रेखाओं के किनारों पर पसीने से युक्त उंगलियों का मलिन निशान दिखायी दे रहा है और रंग के फूल जाने के कारण यह (शकुन्तला) के गालों पर गिरा हुआ आंसू (भी) दृष्टिगोचर हो रहा है ।
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