सानुमती:--
पश्चाताप के कारण बढ़े हुये (गुरु) प्रेम और अभिनशुन्यता के अनुरूप ही यह (कथन) है ।
विदूषक:--
हे (मित्र) (इस चित्रपट में) तीन माननीय युवतियाँ दिखायी दे रहीं हैं । सभी दर्शनीय (सुंदर) हैं । यहाँ (इनमें) श्रीमती शकुन्तला कौन हैं ?
सानुमती:--
निष्फल दृष्टि वाला यह व्यक्ति (विदूषक) निश्चय ही इस प्रकार के अनुपम रूप से अनभिज्ञ है ।
राजा:--
तुम (इनमें से) किसको (शकुन्तला) समझ रहे हो ?
विदूषक:--
मैं समझता हूँ कि ढीली चोटी से गिर गये है पुष्प जिसके ऐसे केशपाश वाली उभरी हुई (दिखायी देने वाली) पसीने की बूंदों वाले मुख (तथा) अत्यधिक झुकी हुई भुजाओं से युक्त और सीचने के कारण चिकने नवीन पत्तों वाले आम्र-वृक्ष के समीप कुछ थकी हुई सी जो चित्रित की गयी है, वह शकुन्तला हैं । दूसरी दो सखियाँ हैं ।
राजा:--
आप (सचमुच) चतुर हो । यहाँ (इस चित्र में) मेरे (सात्विक) भाव का सङ्केत (चिन्ह) है । (चित्र की) रेखाओं के किनारों पर पसीने से युक्त उंगलियों का मलिन निशान दिखायी दे रहा है और रंग के फूल जाने के कारण यह (शकुन्तला) के गालों पर गिरा हुआ आंसू (भी) दृष्टिगोचर हो रहा है ।
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