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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 16
चतुरिके, अर्धलिखितमेतद्‌ विनोदस्थानम्‌ । गच्छ, वर्तिकां तावदानय । चतुरिका- आर्य माधव्य, अवलम्बस्व चित्रफलकं यावदागच्छामि । राजा--अहमेवैतदवलम्बे । (इति यथोक्तं करोति) । (निष्क्रान्ता चेटी) राजा-(निःधस्य) अह हि-- साक्षात्‌ प्रियामुपगतामपहाय पूर्वं चित्र्पितां पुनरिमां बहु मन्यमानः । स्रोतोवहां पथि निकामजलामतीत्य जातः सखे प्रणययान्मृगतृष्णिकायाम्‌ ।।
चतुरिका, (मेरे) मनोरंजन का यह साधन अधुरा (ही) चित्रित है । तो जाओ, (चित्र मे रंग भरने के लिये) कूची (ब्रश) ले आओ । चतुरिका:-- आर्य माधव्य, चित्रपट को पकड़िये, जब तक मैं आती हूँ । राजा:-- मैं ही इसको पकड़ता हूँ । (कहने के अनुसार करता है अर्थात्‌ चित्रपट पकड़ता है) । (दासी निकल जाती है) राजा:-- (लम्बी संस लेकर) मैं तो हे मित्र, पहले साक्षात्‌ (स्वयम्‌) समीप में आयी हुई (प्राप्त हुई) प्रिय (शकुन्तला) को त्यागकर अब चित्रगत इसको बहुत समझता हुआ (बहुत आदर देता हुआ) मैं मार्ग मे अधिक जल वाली नदी को लांघकर (छोडकर) मृगतृष्णा (मृगमरीचिका) में प्रेम करने वाला हो गया हूँ ।
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