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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 18
विदूषकः- (आत्मगतम्‌) यथाहं पश्यामि पृरितव्यमनेन चित्रफलकं लम्बकूचनिां तापसानां कदम्बैः । राजा-- वयस्य, अन्यच्च । शकुन्तलायाः प्रसाधनमभिप्रेतमन्र विस्पृतम । विदूषकः-- किमिव ? सानुमती-- वनवासस्य सौकुमार्यस्य विनयस्य च यत्सदृशं भविष्यति । राजा-कृतं न कर्णार्पितबन्धनं सखे शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम्‌ । न वा शरच्चन््रमरीचिकोमलं मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे ।।
विदूषक:-- (अपने मन में) जैसा मैं देख रहा हूँ कि इनके द्वारा यह चित्रपट लम्बी दाढ़ी वाले तपस्वियों के झुंड से भर दिया जायेगा । राजा:-- हे मित्र, ओर भी । शकुन्तला की जो सजावट हम करना चाहते थे, वह यहाँ (चित्र में) भूल ही गये हैं ? विदूषक:-- वह क्या ? सानुमती:-- जो वनवास, सुकुमारता और विनय के अनुकूल होगा । राजा:-- हे मित्र, कानों मे संलप्र डण्ठल वाला और कपोलों तक लटकते हुये केसर (पराग) वाला शिरीष (शिरस) का पुष्प नहीं चित्रित किया गया है तथा स्तनों के बीच में शरद्‌ ऋतु के चन्द्रमा की किरणों के समान कोमल कमल-नाल का हार (भी) नहीं रचा गया (बनाया गया) है ।
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