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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 25
चतुरिका-(ससम्भ्रमवलोक्य) समाश्वसितु समाश्चासतु भर्ता । सानुमती- हा धिक्‌ हा धिक्‌ । सति खलु दीपे व्यवधानदोषेणैषोऽन्धकारदोषमनुभवति । अहमिदानीमेव निर्वृतं करोमि । अथवा श्रुतं मया शकुन्तलां समाश्चासयन्त्या महेन््रजनन्या मुखाद्‌ यज्ञभागोत्सुका देवा एव तथाऽनुष्ठास्यन्ति यथाचिरेण धर्मपत्नी भर्ताभिनन्दिष्यतीति । तद्‌ युक्तमेतं कालं प्रतिपालयितुम्‌ । यावदनेन वृत्तान्तेन प्रियसखीं समाश्चासयामि । (नेपथ्ये) अब्रह्मण्यम्‌ । राजा (परत्यागतचेतनः, कर्णं दत्वा) अये, माधव्यस्येवार्तस्वरः । कः कोऽत्र भोः ? (प्रविश्य) प्रतीहारी- (ससम्भ्रमम्‌) परित्रायतां देवः संशयगतं वयस्यम्‌ । राजा- केनात्तगन्धो माणवकः ? प्रती हारा - अदृष्टरूपेण केनापि सत्वे नातिक्रम्य मेघप्रतिच्छन्दस्य प्रासादस्याग्रभूमिमारोपितः । राजा-- (उत्थाय) मा तावत्‌ । ममापि सत्त्वैरभिभूयन्ते गृहाः । अथवा-- अहन्यहन्यात्मन एव तावज्ज्ञातुं प्रमादस्खलितं न शक्यम्‌ । प्रजासु कः केन पथा प्रयातीत्यशेषतो वेदितुमस्ति शक्तिः ।।
चतुरिका:-- (घबराहट के साथ देख कर) स्वामी (आप) धैर्य धारण करें, धैर्य धारण करें । सानुमती:-- हाय धिक्कार है, हाय धिक्कार है । (पुत्ररूप) दीपक के होने पर भी (मोहरूप आवरण-दोष के कारण ये (राजा) अन्धकार (निःसन्तान) होने का अनुभव कर रहे हैं । मैं इसी समय ही (इनको शकुन्तला का समाचार देकर) शान्त कर देती हूँ । अथवा शकुन्तला को आश्वासन देती हुई इन्द्र की माता (अदिति) के मुख से मैने सुना था कि यज्ञ में (अपने) भाग (को पाने) के लिये उत्सुक देवता ही वैसा (उपाय) करेंगे, जिससे शीघ्र ही महारज (दुष्यन्त अपनी) धर्म-पत्नी (शकुन्तला) को अभिनन्दित करेंगे (अर्थात्‌ स्वागत-पूर्वक स्वीकार कर लेंगे)। तो उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिये । तब तक इस (राजा) के वृत्तान्त से (अपनी) प्रियसखी शकुन्तला को सान्त्वना देती हूं । (उदुप्रान्तक नृत्य के साथ निकल जाती है) । (नेपथ्य में) अनिष्ट हो गया । राजा:-- (चेतना में आकर, कान लगाकर) अरे, माधव्य के समान करुण क्रन्दन है । अरे, कौन है, कौन है यहाँ ? (प्रवेश कर) प्रतीहारी:-- (घबराहट के साथ) महाराज, संकट में पड़े हुये मित्र (माधव्य) की रक्षा की जाय। राजा:-- किसके द्वारा बेचारा (माणवक) अभिभूत (अपमानित) हुआ है ? प्रतीहारी:-- अदृष्ट रूप वाले किसी प्राणी (भूत-प्रेत आदि) के द्वारा पकड़ कर "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन की ऊपरी छत पर वह ले जाया गया है । राजा:-- (उठकर) ऐसा न (कहो) । क्या मेरे भी घर भूत-प्रेतों द्वारा अक्रमण किये जाने लगे हैं? अथवा प्रतिदिन अपनी ही प्रमाद्‌-जन्य (प्रमाद के कारण उत्पन्न) त्रुटियों को जानना सम्भव नहीं है । (तब) प्रजाजनों में कौन किस मार्ग से जा रहा है, यह पूर्णरूप से जानने में (किसका) सामर्थ्य है ।
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