चतुरिका:--
(घबराहट के साथ देख कर) स्वामी (आप) धैर्य धारण करें, धैर्य धारण करें ।
सानुमती:--
हाय धिक्कार है, हाय धिक्कार है । (पुत्ररूप) दीपक के होने पर भी (मोहरूप आवरण-दोष के कारण ये (राजा) अन्धकार (निःसन्तान) होने का अनुभव कर रहे हैं । मैं इसी समय ही (इनको शकुन्तला का समाचार देकर) शान्त कर देती हूँ । अथवा शकुन्तला को आश्वासन देती हुई इन्द्र की माता (अदिति) के मुख से मैने सुना था कि यज्ञ में (अपने) भाग (को पाने) के लिये उत्सुक देवता ही वैसा (उपाय) करेंगे, जिससे शीघ्र ही महारज (दुष्यन्त अपनी) धर्म-पत्नी (शकुन्तला) को अभिनन्दित करेंगे (अर्थात् स्वागत-पूर्वक स्वीकार कर लेंगे)। तो उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिये । तब तक इस (राजा) के वृत्तान्त से (अपनी) प्रियसखी शकुन्तला को सान्त्वना देती हूं । (उदुप्रान्तक नृत्य के साथ निकल जाती है) ।
(नेपथ्य में) अनिष्ट हो गया ।
राजा:--
(चेतना में आकर, कान लगाकर) अरे, माधव्य के समान करुण क्रन्दन है । अरे, कौन है, कौन है यहाँ ?
(प्रवेश कर) प्रतीहारी:--
(घबराहट के साथ) महाराज, संकट में पड़े हुये मित्र (माधव्य) की रक्षा की जाय।
राजा:--
किसके द्वारा बेचारा (माणवक) अभिभूत (अपमानित) हुआ है ?
प्रतीहारी:--
अदृष्ट रूप वाले किसी प्राणी (भूत-प्रेत आदि) के द्वारा पकड़ कर "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन की ऊपरी छत पर वह ले जाया गया है ।
राजा:--
(उठकर) ऐसा न (कहो) । क्या मेरे भी घर भूत-प्रेतों द्वारा अक्रमण किये जाने लगे हैं? अथवा प्रतिदिन अपनी ही प्रमाद्-जन्य (प्रमाद के कारण उत्पन्न) त्रुटियों को जानना सम्भव नहीं है । (तब) प्रजाजनों में कौन किस मार्ग से जा रहा है, यह पूर्णरूप से जानने में (किसका) सामर्थ्य है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।