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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 12
सानुमती-- यद्यन्यहस्तगतं भवेत्‌ सत्यमेव शोचनीयं भवेत्‌ । विदूषकः-- भोः, इयं नाममुद्रा केनोद्घातेन तत्रभवत्या हस्ताभ्याशं प्रापिता ? सानुमती- ममापि कौतूहलेनाकारित एषः । राजा-- श्रूयताम्‌ । स्वनगराय प्रस्थितं मां प्रिया सबाष्पमाह कियच्चिरेणार्यपुत्रः प्रतिपत्ति दास्यतीति । विदूषकः ततस्ततः ? राजा- पश्चादिमां मुद्रा तदङ्कलौ निवेशयता मया प्रत्यभिहिता-- एकैकमत्र दिवसे दिवसे मदीयं नामाक्षरं गणय गच्छसि यावदन्तम्‌ । तावत्‌ - प्रिये मदवरोधगृहप्रवेशं नेता जनस्तव समीपमुपैष्यतीति ।।
सानुमती:-- यदि यह (अँगूठी) दूसरे के हाथ में पड़ जाती तो सचमुच ही शोचनीय (शोक के योग्य) हो जाती । विदूषक:-- हे (मित्र), यह नाम वाली (नामांकित) अँगूठी किस प्रसङ्ग से उन माननीय (शकुंतला) के हाथ में दी गयी थी ? सानुमती:-- यह (विदूषक) भी मेरे (समान) जिज्ञासा से प्रेरित हुआ है (अर्थात्‌ मेरे समान ही इसको भी यह जानने की इच्छा है) । राजा:-- सुनो । अपने नगर (हस्तिनापुर) को प्रस्थान करते हुये मुझसे प्रिय (शकुन्तला) ने (आंखों मे) आंसू भरकर कहा (था) - आर्यपुत्र कितने दिनों मे (आप मुझे अपना) समाचार देंगे । विदूषक:-- तब, तब (क्या हुआ) फिर क्या हुआ ? राजा:-- तत्पश्चात्‌ इस अँगूठी को उसकी उंगली में पहनाते हुये मेरे द्वारा (यह) कहा गया (मैंने उससे कहा) - हे प्रिये, प्रतिदिन (इस अँगूठी पर ख़ुदे हुये) मेरे नाम के एक-एक अक्षर को गिनना । जब तक तुम (गिनती हुई) अन्त को (अर्थात्‌ अन्तिम अक्षर पर) पहंचोगी तब तक मेरे अन्तःपुर में प्रवेश कराने के लिये (तुम्हें) ले जाने वाला व्यक्ति तुम्हारे पास पहुंच जायेगा ।
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