सानुमती:--
यदि यह (अँगूठी) दूसरे के हाथ में पड़ जाती तो सचमुच ही शोचनीय (शोक के योग्य) हो जाती ।
विदूषक:--
हे (मित्र), यह नाम वाली (नामांकित) अँगूठी किस प्रसङ्ग से उन माननीय (शकुंतला) के हाथ में दी गयी थी ?
सानुमती:--
यह (विदूषक) भी मेरे (समान) जिज्ञासा से प्रेरित हुआ है (अर्थात् मेरे समान ही इसको भी यह जानने की इच्छा है) ।
राजा:--
सुनो । अपने नगर (हस्तिनापुर) को प्रस्थान करते हुये मुझसे प्रिय (शकुन्तला) ने (आंखों मे) आंसू भरकर कहा (था) - आर्यपुत्र कितने दिनों मे (आप मुझे अपना) समाचार देंगे ।
विदूषक:--
तब, तब (क्या हुआ) फिर क्या हुआ ?
राजा:--
तत्पश्चात् इस अँगूठी को उसकी उंगली में पहनाते हुये मेरे द्वारा (यह) कहा गया (मैंने उससे कहा) - हे प्रिये, प्रतिदिन (इस अँगूठी पर ख़ुदे हुये) मेरे नाम के एक-एक अक्षर को गिनना । जब तक तुम (गिनती हुई) अन्त को (अर्थात् अन्तिम अक्षर पर) पहंचोगी तब तक मेरे अन्तःपुर में प्रवेश कराने के लिये (तुम्हें) ले जाने वाला व्यक्ति तुम्हारे पास पहुंच जायेगा ।
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