(नेपथ्य में) हे मित्र, बचाओ, बचाओ ।
राजा:--
(चाल बदलकर घूमता हुआ) हे मित्र, डरो मत, डरो मत।
(नेपथ्य में) (उसी बात को फिर कहकर) क्यो न डरूं ? यह कोई मेरी गर्दन को घुमाकर गन्ने की तरह तीन टुकड़े कर रहा है ।
राजा:--
(दृष्टि घुमाकर) तो धनुष (ले आओ) ।
(हाथ में धनुष ली हई प्रवेशकर)
यवनी:--
स्वामी, हस्तकवच (दास्ताने) के सहित यह धनुष है ।
(राजा बाण के सहित धनुष को ले लेते हैं) ।
(नेपथ्य में)
गर्दन के ताजे रक्त का इच्छुक मैं छटपटाते हुये तुम (विदूषक) को (उसी प्रकार) मारता हूँ, जैसे बाघ (छटपटाते हुये) पशु को मारता है । पीड़ितों के भय को दूर करने के लिये धनुष को धारण कर लेने वाला दुष्यन्त अब तुम्हारा रक्षक बने ।
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