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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 26
(नेपथ्ये) भो वयस्य, अविहा अविहा । राजा--(गतिभेदेन परिक्रामन्‌) सखे, न भेतव्यं न भेतव्यम्‌ । (नेपथ्ये)- (पुनस्तदेव पठित्वा) कथं न भेष्यामि ? एष मां कोऽपि प्रत्यवनतशिरोधरभिश्चुमिव त्रिभङ्गं करोति । राजा-- (सदृष्टिक्षेपम्‌) धनुस्तावत्‌ । (प्रविश्य शार्ङ्गहस्ता) यवनी-- भर्तः, एतद्‌ हस्तावापसहितं शरासनम्‌ । (राजा सशरं धनुरादत्ते) (नेपथ्ये)- एषस्त्वामभिनवकण्ठशोणिता्थीं शार्दूलः पशुमिव हन्मि चेष्टमानम्‌ । आर्तानां भयमपनेतुमात्तथन्वा दुष्यन्तस्तव शरणं भवत्विदानीम्‌ ।।
(नेपथ्य में) हे मित्र, बचाओ, बचाओ । राजा:-- (चाल बदलकर घूमता हुआ) हे मित्र, डरो मत, डरो मत। (नेपथ्य में) (उसी बात को फिर कहकर) क्यो न डरूं ? यह कोई मेरी गर्दन को घुमाकर गन्ने की तरह तीन टुकड़े कर रहा है । राजा:-- (दृष्टि घुमाकर) तो धनुष (ले आओ) । (हाथ में धनुष ली हई प्रवेशकर) यवनी:-- स्वामी, हस्तकवच (दास्ताने) के सहित यह धनुष है । (राजा बाण के सहित धनुष को ले लेते हैं) । (नेपथ्य में) गर्दन के ताजे रक्त का इच्छुक मैं छटपटाते हुये तुम (विदूषक) को (उसी प्रकार) मारता हूँ, जैसे बाघ (छटपटाते हुये) पशु को मारता है । पीड़ितों के भय को दूर करने के लिये धनुष को धारण कर लेने वाला दुष्यन्त अब तुम्हारा रक्षक बने ।
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