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अध्याय 2 — साधना पाद
योगसूत्र
55 श्लोक • केवल अनुवाद
तप, अध्यात्मशास्त्रों के पठन-पाठन और ईश्वर शरणागति - ये तीनों क्रिया योग हैं।
यह क्रियायोग समाधि की सिद्धि के लिए और अविद्यादि क्लेशों को क्षीण करने के लिए है।
अविद्या, अस्मिता (अहंकार), राग, द्वेष और अभिनिवेश (जीवन के प्रति ममता) - ये पाँचों क्लेश हैं।
अविद्या ही अगले शेष चार अर्थात् अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेशों का उत्पत्ति क्षेत्र है, जो प्रसुप्त, शिथिल कर दिए गए, कभी अन्य वृत्ति के द्वारा विच्छिन्न अर्थात् अभिभूत होकर और उदार होकर - इन चार प्रकार की अवस्थाओं वाले होते हैं ।
अनित्य, अपवित्र, दुख और आत्मा से भिन्न पदार्थ में यथाक्रम से नित्य , पवित्र , सुख और आत्माभाव की अनुभूति 'अविद्या' है ।
दृक-शक्ति और दर्शन-शक्ति इन दोनों का एकरूप - जैसा भान होना अस्मिता क्लेश है।
सुख की प्रतीति के पीछे अर्थात् सुख को भोगने की इच्छा - राग क्लेश है।
दु:ख की प्रतीति के पीछे अर्थात् दु:ख को न भोगने की इच्छा द्वेष क्लेश है।
जो परम्परागत स्वभाव से चला आ रहा है एवं, जो मूढ़ों की भाँति विवेकशील पुरुषों में भी विद्यमान देखा जाता है, वह अभिनिवेश अर्थात् जीवन के प्रति ममता है ।
वे पूर्वोक्त पाँच क्लेस, जो क्रिया योग से सूक्ष्मावस्था को प्राप्त हैं, चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन द्वारा नष्ट करने योग्य हैं ।
वृत्तियाँ ध्यान के द्वारा नष्ट करने योग्य हैं ।
क्लेश जिसकी मूल है, ऐसे कर्मसंस्कारों का समुदाय वर्तमान और भविष्य में होनेवाले जन्मों में भोगा जानेवाला है।
मूल के विद्यमान रहनेतक उस कर्माशय का परिणाम जन्म, आयु और भोग के रूप में प्राप्त होता रहता है।
वे (जन्म, आयु और भोग) हर्ष शोकरूपी फल देते हैं, क्योंकि पुण्य और पाप उनके यथाक्रम से कारण हैं ।
परिणाम दु:ख, ताप दु:ख और संस्कार दु:ख, इन तीन प्रकार के दु:खों के कारण और तीनों गुणों की वृत्तियों में परस्पर विरोधी स्वभाव के कारण विवेकी के लिए सब-के-सब कर्मफल दु:खरूप ही हैं ।
जो आया नहीं है आनेवाला है वह दु:ख त्यागने योग्य है ।
द्रष्टा और दृश्य का संयोग उक्त दु:ख का कारण है ।
प्रकाश क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और इन्द्रियाँ जिसका स्वरूप हैं, पुरुष के लिए भोग और मुक्ति ही जिसका प्रयोजन है, वह दृश्य है ।
विशेष, अविशेष, लिंगमात्र और अलिंग - ये चार सत्त्वादि गुणों के भेद अर्थात् अवस्थाएँ हैं ।
द्रष्टा जो चेतनमात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा है । यद्यपि वह शुद्ध अर्थात् निर्विकार होता हुआ भी बुद्धिवृत्ति के अनुरूप देखनेवाला है ।
उक्त दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा के लिए ही है ।
जिसका प्रयोजन अर्थात् भोग और अपवर्गरूप कार्य पूर्ण हो गया है, उस पुरुष के लिए नाश को प्राप्त हुई भी वह प्रकृति नष्ट नहीं होती है, क्योंकि वह दूसरों अर्थात् जिन पुरुषों का प्रयोजन अभी सिद्ध नहीं हुआ, उनके लिये साधारण है ।
दृश्य (प्रकृति) और स्वामी (द्रष्टा पुरुष) इन दोनों शक्तियों के स्वरूप की प्राप्ति का कारण संयोग है ।
उस संयोग का कारण अविद्या है ।
उस अविद्या के अभाव से संयोग का अभाव हो जाता है, यही हान अज्ञान का परित्याग है और वही द्रष्टा चेतन आत्मा का 'कैवल्य' अर्थात् मोक्ष है ।
उस अविद्या के अभाव से संयोग का अभाव हो जाता है, यही हान अज्ञान का परित्याग है और वही द्रष्टा चेतन आत्मा का 'कैवल्य' अर्थात् मोक्ष है ।
उस (निर्मल विवेकख्याति वाले योगी) की सात प्रकार की अन्तिम स्थिति वाली बुद्धि होती है ।
योग के विभिन्न अंगों का अनुष्ठान से अपवित्रता के नाश होने पर ज्ञान का प्रकाश विवेकख्यातिपर्यन्त हो जाता है ।
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि; ये आठ योग के अंग हैं ।
अहिंसा, यथार्थ ज्ञान, अस्तेय(चाेरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह(संग्रह का अभाव) - ये पाँच यम हैं ।
उक्त यम जाति, देश, काल और विशेष नियम की सीमा से रहित और सब अवस्थाओं में पालन करने योग्य महाव्रत कहलाते हैं ।
बाह्य एवं अंत:स्वच्छता संतुष्टि तप स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति - ये पाँच नियम हैं।
वितर्क यम और नियमों के हिंसादि के भाव यम-नियम के पालन में बाधा पहुँचावें तब उनके प्रतिपक्षी विचारों का बारंबार चिन्तन करना चाहिए ।
यम और नियमों के विरोधी हिंसा आदि भाव वितर्क कहलाते हैं; जो तीन प्रकार के होते हैं - स्वयं किए हुए दूसरों से करवाये हुए और अनुमोदित किए हुए । इनके कारण हैं - लोभ, क्रोध और मोह । इनमें भी कोई मृदु, मध्यम और बड़ा होता है ये क्लेश और अज्ञान का अनन्त फल देनेवाले हैं । ऐसा विचार करना ही प्रतिपक्ष की भावना है ।
अहिंसा की दृढ़ स्थिति हो जाने पर उस योगी के निकट सब प्राणी वैरभाव त्याग कर देते हैं ।
सत्य में दृढ़ स्थिति हो जाने पर उस योगी की क्रिया अर्थात् कर्म फल के आश्रय का भाव आ जाता है।
अस्तेय अर्थात् चोरी के अभाव में दृढ़ स्थिति हो जाने पर उस योगी के सामने सब प्रकार के रत्न प्रकट हो जाते हैं ।
ब्रह्मचर्य में दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है ।
अपरिग्रह के दृढ़ प्रतिष्ठित हो जानेपर; पूर्वजन्म कैसे हुए थे ? इस बात का भलीभाँति ज्ञान हो जाता है।
शौच के पालन से अपने अंगों में वैराग्य और दूसरों के साथ संसर्ग न करने की भी फिर प्रवृत्ति नहीं रहती ।
इसके सिवा इस शौच से अन्तःकरण की शुद्धि, मन का प्रफुल्ल भाव, चित्त की एकाग्रता, इन्द्रियों पर जीत और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता - ये पाँचों भी होते हैं ।
संतोष से परम सुख प्राप्त होता है ।
साधक द्वारा निरन्तर तप के अनुष्ठान से अशुद्धि का नाश होने पर उसके शरीर व इन्द्रियों में विशेष प्रकार का सामर्थ्य एवं सात्विकता आ जाती है जिसे काय सिद्धि एवं इन्द्रिय सिद्धि कहा जाता है।
सद्ग्रन्थों एवं गुरुमुख से सुने ज्ञान का अध्ययन करने से विद्वान, ऋषि-मुनि एवं योग एवं स्वाध्यायनिष्ठ योगियों से उनका साक्षात् दर्शन एवं उनकी अनुकम्पा प्राप्त हो जाती है।
ईश्वर की भक्ति विशेष करने एवं फल की इच्छा किये बिना शुभ अशुभ सब प्रकार के कर्मों को ईश्वर में समर्पित करने से शीघ्र ही समाधि की प्राप्ति हो जाती है ।।
शरीर की स्थिति विशेष जिसमें शरीर बिना हिले- डुले स्थिर व सुखपूर्वक देर तक बैठा रह सकता है, उस अवस्था को आसन कहते हैं ।
आसन करते समय शारीरिक गतिविधियों या चेष्टाओं को सहज प्रयत्न द्वारा शिथिल या रोक देने से और अनन्त (आकाश या परमात्मा) में सहज ध्यान लगाने से साधक के आसन की सिद्धि हो जाती है ।
आसन के सिद्ध हो जाने पर साधक को सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, लाभ- हानि आदि द्वन्द्व आघात अर्थात कष्ट उत्पन्न नहीं करते हैं ।
आसन की सिद्धि हो जाने पर प्राणवायु को अन्दर लेने (पूरक) व प्राणवायु को बाहर छोड़ने की (रेचक) की सहज गति को अपने सामर्थ्य अनुरूप रोक देना या स्थिर कर देना ही प्राणायाम कहलाता है ।
बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति व स्तम्भवृत्ति ये तीन प्राणायाम स्थान, समय व गणना के द्वारा ठीक प्रकार से देखा व जाना से प्राण लम्बा व हल्का हो जाता है ।
श्वास को बाहर रोकने व अन्दर रोकने के विषय अर्थात कार्य का त्याग या विरोध करने वाला यह चौथा प्राणायाम है।
प्राणायाम के अनुष्ठान से विवेकज्ञान के ऊपर पड़े अज्ञान की परत कमजोर होने लगती है।
प्राणायाम के करने से मन को कहीं पर भी एकाग्र करने या लगाने का सामर्थ्य बढ़ जाता है ।
जब सभी इन्द्रियों का अपने –अपने कार्यों के साथ सम्बन्ध न होने से वे इन्द्रियां चित्त के वास्तविक स्वरूप के जैसे हो जाती हैं । इन्तोद्रियों की ऐसी स्थिति को प्रत्याहार कहते हैं ।
उस प्रत्याहार के सिद्ध होने से योगी साधक का इन्द्रियों पर पूरी तरह से नियंत्रण हो जाता है ।
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