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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 41
सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च॥ सत्त्व , शुद्धि , सौमनस्य , ऐकाग्र्य , इन्द्रिय , जय , आत्मदर्शन , योग्यत्वानि , च ॥
इसके सिवा इस शौच से अन्तःकरण की शुद्धि, मन का प्रफुल्ल भाव, चित्त की एकाग्रता, इन्द्रियों पर जीत और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता - ये पाँचों भी होते हैं ।
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