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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 43
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः ॥ काय-इन्द्रिय-सिद्धि:-अशुद्धि-क्षयात्, तपस:॥
साधक द्वारा निरन्तर तप के अनुष्ठान से अशुद्धि का नाश होने पर उसके शरीर व इन्द्रियों में विशेष प्रकार का सामर्थ्य एवं सात्विकता आ जाती है जिसे काय सिद्धि एवं इन्द्रिय सिद्धि कहा जाता है।
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