साधक द्वारा निरन्तर तप के अनुष्ठान से अशुद्धि का नाश होने पर उसके शरीर व इन्द्रियों में विशेष प्रकार का सामर्थ्य एवं सात्विकता आ जाती है जिसे काय सिद्धि एवं इन्द्रिय सिद्धि कहा जाता है।
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