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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 22
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥ कृतार्थम् , प्रति , नष्टम् , अपि , अनष्टम् , तत् , अन्य , साधारणत्वात् ॥
जिसका प्रयोजन अर्थात् भोग और अपवर्गरूप कार्य पूर्ण हो गया है, उस पुरुष के लिए नाश को प्राप्त हुई भी वह प्रकृति नष्ट नहीं होती है, क्योंकि वह दूसरों अर्थात् जिन पुरुषों का प्रयोजन अभी सिद्ध नहीं हुआ, उनके लिये साधारण है ।
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