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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 37
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥ अस्तेय , प्रतिष्ठायाम् , सर्व , रत्न , उपस्थानम् ॥
अस्तेय अर्थात् चोरी के अभाव में दृढ़ स्थिति हो जाने पर उस योगी के सामने सब प्रकार के रत्न प्रकट हो जाते हैं ।
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