ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥
ते , ह्लाद , परिताप , फलाः , पुण्य , अपुण्य , हेतुत्वात् ॥
वे (जन्म, आयु और भोग) हर्ष शोकरूपी फल देते हैं, क्योंकि पुण्य और पाप उनके यथाक्रम से कारण हैं ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
योगसूत्र के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
योगसूत्र के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।