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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 14
ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥ ते , ह्लाद , परिताप , फलाः , पुण्य , अपुण्य , हेतुत्वात् ॥
वे (जन्म, आयु और भोग) हर्ष शोकरूपी फल देते हैं, क्योंकि पुण्य और पाप उनके यथाक्रम से कारण हैं ।
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