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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 20
द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥ द्रष्टा , दृशिमात्रः , शुद्ध: , अपि , प्रत्यय: , अनुपश्यः ॥
द्रष्टा जो चेतनमात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा है । यद्यपि वह शुद्ध अर्थात् निर्विकार होता हुआ भी बुद्धिवृत्ति के अनुरूप देखनेवाला है ।
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