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योगसूत्र • अध्याय 2 • श्लोक 4
अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥ अविद्या , क्षेत्रम् , उत्तरेषाम् , प्रसुप्त , तनु , विच्छिन्न , उदाराणाम् ॥
अविद्या ही अगले शेष चार अर्थात् अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेशों का उत्पत्ति क्षेत्र है, जो प्रसुप्त, शिथिल कर दिए गए, कभी अन्य वृत्ति के द्वारा विच्छिन्न अर्थात् अभिभूत होकर और उदार होकर - इन चार प्रकार की अवस्थाओं वाले होते हैं ।
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