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अध्याय 2 — चर्चास्तवः

पञ्चस्तवी
31 श्लोक • केवल अनुवाद
पायजेब नूपुर की घनघनाहट के कारण मनोहारी, महिषासुर के सिर पर आग्रह-पूर्वक रखा गया है और इसी कारण आनन्द से सुन्दर अर्थात् प्रसत्र बने हुए इन्द्र द्वारा उपहार की गई माला वाला माता दुर्गा जगज्जननी का सुन्दर-चरण कमल मेरी विजय के लिये बना रहे।
हे त्रिपुरा भगवती ! हे जगन्माता ! आपके निमित्त (भक्त जनों के द्वारा) किये गये प्रणाम, अनन्त सुन्दरता के जन्म-दाता हैं। चक्रवर्ती-राजा की संपत्ति को देने में कल्प-वृक्षों के समान हैं। ये प्रणाम, कविता रूपी कुमुद-कमलों के समूह को विकसित करने के लिए पूर्णिमा के चन्द्रमा के तुल्य हैं। भाव यह है कि जो जन आपको प्रणाम करते हैं उन्हें आन्तरिक तथा बाह्य-सुन्दरता जगन्माता प्रदान करती है। वे चक्रवर्ती राज्य को प्राप्त करके अनन्त समय के लिये ऐश्वर्य भोगते हैं तथा उन्हें कविता का प्रादुर्भाव धारावाहिक रूप से होने लगता है।
हे देवी ! आपके स्तुति-रचनात्मक परिश्रम करने में बुद्धि-पारंगत बने हुए बृहस्पतिपाद आदि विद्वान् भी मूक बन जाते हैं, अर्थात् आपकी स्तुति नहीं कर सकते हैं। इसलिए हे त्रिपुरारि शंकर की महारानी ! स्वभाव से ही जड अर्थात् मूर्ख मैं, आपको स्तुति करने में गिनती ही क्या रखता हूं।
हे माता ! हे भवानी ! (यद्यपि मैं आपकी स्तुति करने में असमर्थ हूं) क्योंकि आपकी स्तुति एक अथाह समुद्र के तुल्य है और इसके पार होना मनुष्य के पुरुषार्थ से बाहर है, तथापि आपके चरण-कमलों की अलौकिक भक्ति ही इस उपरोक्त स्तुति-रचनात्मक समुद्र में एक प्रवीण नाविक के समान सहायक है। वही भक्ति सांसारिक दुःखों को हटाने के निमित्त मुझे आपकी स्तुति करवाने में मुखर अर्थात् वाचाल बना देती है।
हे माता ! आप इन सभी सांसारिक मण्डलों की उत्पत्ति करती हैं, इनका पालन पोषण करती हैं और इनका नाश करने के लिए होशियार अर्थात् सन्नद्ध बनी रहती हैं। इसके अतिरिक्त आप तिरोधानात्मक एवं अज्ञान रूपी मोह को काटती हैं तथा उस मोह को फिर से (आश्यानीभावात्त्मक) स्थिति देती हैं, अतः आपकी इस विचित्र लीलामय क्रीड़ा की जय हो ।
नवीन कमलों के पत्तों के समान श्वेत-वर्ण वाली हे पार्वती! दया से मधुर बनी हुई अपनी दृष्टि आप जिस भक्त पर तनिक मात्र भी डालती हैं उसकी ओर दया-पूर्ण दृष्टि से देखती हैं, उस भक्त का मानसिक संकल्प विकल्पों से छलनी बना हुआ मन तथा मन की वृत्तियों की पंक्ति सदा के लिए स्वयं अर्थात् बिना किसी प्रयास के निश्चेष्ट हो जाती हैं अर्थात् वह एकाग्र बन कर समाधि-निष्ठ बनता है।
उस श्रेष्ठ राजा उदयन को, जो चक्रवर्ती पदवी की बढ़ाई प्राप्त हुई थी तथा जिस के राज्य-सिंहासन के पाद-पाठ को प्रणाम करके और चूम कर विद्याधर गण अपना अहोभाग्य समझते थे। (इस भांति उसके संपूर्ण ऐश्वर्य का होना) आपके ही चरण कमलों की धूलि के एक कण-मात्र की दया थी।
हे पार्वती । विद्याधर-गण कल्प वृक्षों के पुष्यों से आपकी अनूठी पूजा करके सुवर्णमय सुमेरु पर्वत की कन्दराओं में अत्यन्त ज्वाज्वल्यमान तथा अपने प्रिय हर्ष-युक्त गीतों को सदैव वीणाओं पर बजाते रहते हैं तथा आपके गुणों का गान करते हैं।
हे देवि । आपके चरणों से उत्पन्न अनुग्रह, अनन्त संपदाओं को वशीभूत करने में तथा कामिनियों अर्थात् अद्वैत-प्रधान अष्ट सिद्धियों को अपने स्वाधीन बनाने में सिद्ध राम-बाण की भांति अचूक मन्त्र है एवं घने अज्ञान रूपी अंधकार को छिन्न-भिन्न करने में दीपक के समान है। उसी आपकी दया की जय हो।
हे देवी ! आपके चरणों के नाखून रूपी रत्नों से उत्पन्न सौन्दर्य की किरणें प्रत्येक नाखून के अग्रभाग पर मोती की कांति के समान चमक से आनन्द को प्राप्त करती हैं, तथा वे किरणें सेवा के कारण नत-मस्तक रहने वाली देवस्त्रियों के मांग के स्थान में गुलदस्ते की भांति आभा से युक्त दिखाई देती हैं।
हे माता ! समस्त प्राणियों के ब्रह्मांड स्थान में जो ज्योति चन्द्रमा की किरणों की कांति के समान विकसित बनी हुई है, तथा प्राणियों के मस्तक के बीच में इन्द्र-धनुष की नाई रंग-बिरंगी अनेक रश्मियों से युक्त जो प्रकाश ठहरा रहता है, एवं प्राणियों के हृदय-स्थान में ठहरी हुई अग्नि के कणों की भांति जो ज्योति अवस्थित है, वे सभी प्रकाश, वास्तव में आपके ही स्वरूप हैं। भाव यह है कि 'ऐं, क्लीं, सौः' - ये आपके बीजाक्षर आपके स्वरूप को ही दिखाते हैं।
जो भक्त, सरस्वती के मुख्य बने हुए (क्लीं) नामक आपके मन्त्र-स्वरूप को विकसित चन्द्रमा की किरणों की भांति श्वेतता से युक्त शिर पर ध्यान करता है, उस भक्त को सीमा-रहित सुन्दर उक्ति रूपी रचनामृत के प्रवाह से युक्त आपकी कृपा के फल-स्वरूप मधुर आकर्षक कवित्वमय वाणी प्रकट होती है।
हे त्रिपुरा देवी ! जो भक्त आपके तेज से आकाश को सिन्दूर के रंग से रंगे हुए तथा लाक्ष-रस से लाल बनी हुई पृथ्वी को क्षणमात्र के लिए भी ध्यान करके देखता है, उसे इन्द्रिय-वृत्तियां लज्जा को त्याग कर अर्थात् बिना किसी रुकावट से पीछे-पीछे दौड़ती हैं अर्थात् पूर्ण रूप से स्ववशवर्ती बन जाती हैं।
हे माता ! जो भक्त एक मुहूर्त के लिए भी आपके स्वरूप का ध्यान, प्रसारित हुए लाक्षारस के समान करता है; अर्थात् आपके स्वरूप का ध्यान परिपूर्ण प्रकाशरूपता से संयुक्त बना हुआ करता है, उसे कामदेव से पीड़ित बनी हुई युवतियां, अर्थात् मानसिक संकल्प-विकल्पों से संक्षुभित बनी हुई इन्द्रियां अपनी चञ्चलता को छोड़ कर कामदेव की नाईं अत्यन्त सुन्दर मानकर एकाग्रता से ध्यान करती हैं, अर्थात् उसकी सभी इन्द्रियां सदा के लिए उसके वशवर्ती बन जाती हैं।
हे देवी ! आकाशरूपी समुद्र का रत्न बना हुआ जो यह चन्द्रमा चमक रहा है, जो यह देवताओं तथा असुरों के गुरु पुरातन पुरुष भगवान् नारायण हैं और जो अन्धकासुर राक्षस को मारने वाले महादेव जी की सुन्दर (अर्धांगिनी) पार्वती जी हैं। "ये सभी तीनों आपका ही स्वरूप हैं" इस प्रकार ज्ञानीजन सिद्ध करते हैं।
हे शिव को अपनी ओर आकर्षित करने वाली देवी! जब आप शिव को अपनी इच्छा के अनुरूप अपने उत्कृष्ट-गुणों के सदृश परामर्श के बल से बनाती हैं तो उसी समय वह भगवान् शिव भी तीन भुवनों का गुरु तथा तीन भुवनों के सृजन और संहार करने में समर्थ सूत्रधार अर्थात् त्रिभुवन-नाटक रचाने में समर्थ बन जाता है।
हे रुद्राणि ! जो भक्त 'विद्रुम' नामक मनके की भांति लाल रंग से युक्त बनी हुई एवं अनुपम प्रतिमा बनी हुई आपके स्वरूप का ध्यान करते हैं, ऐसे उपासकों के पास जाकर, उनके कण्ठ अर्थात् ग्रीवा में लगाये हुए कोमल बाहुलताओं वाली सुन्दर नेत्रों वाली युवतियां निःसंकोच होकर आलिंगन करती हैं।
हे जगन्माता ! जो साधक प्रफुल्लित अनार के फूल की तरह लालिमा से युक्त एवं अविनश्वर कामराजबीजमय आपके स्वरूप को स्वात्माभेदरूपता से ध्यान करता है, ऐसा साधक लावण्य तथा रूप से रहित भी हो तथापि बड़े-बड़े सुन्दर कटितटों बाली युवतियां उसे मन्मथ अर्थात् कामदेव के समान ही अत्यन्त सुन्दर समझती हैं इस प्रकार उसे बड़े प्रेम से अपनाती हैं।
हे हिमालय की पुत्री ! हे सुन्दरी ! जिस भक्त ने चन्द्रमा की किरणावलि की भांति निर्मल प्रकाश से युक्त आपके स्वरूप का ध्यान निष्पाप मन से अर्थात् निर्विकल्प मन से किया हो, उसे आप थोड़े ही दिनों में कविता का प्रसर सृजन करती हैं, जो कविता का प्रसर श्रुति-कटु इत्यादि दोषों से रहित तथा प्रसाद आदि गुणों से संपन्न एवं अस्खलित और धारावाहिक रूप से प्रसरणशील होता है।
हे देवी ! मूलाधार चक्र में प्राणापान रूपी वायु के, सुषुम्ना मार्ग में लय करने के फलस्वरूप जिन भक्तों के हृदय में सिन्दूर से रंगे हुए कमल-पुष्प के समान अत्यन्त प्रकाशमान् आपका स्वरूप विकसित होता है उन भक्तों को अभीष्ट प्राप्ति के लिए सिंद्ध-पुरुष तथा साध्य-देवता (सदैव) ध्यान करते रहते हैं, अर्थात् उन भक्तों को वरदान देने में तत्पर बने रहते हैं।
हे जगन्माता ! चिदाकाश-स्वरूप को उत्तेजित करने वाली चन्द्र-कला के सदृश आपके स्वरूप का जो अपने मस्तक के स्थान पर साक्षात्कार करते हैं, वे साक्षात्कार करने के अनन्तर ही कवित्व-शक्ति-संपन्न अर्थात् सर्वज्ञ आदि गुणों से संयुक्त बनते हैं, यतः समाधि में आरूढ़ प्रज्ञा वालों के लिए आप ही समस्त कामनाओं को देने में समर्थ हैं।
हे देवी ! आप व्यापिनी-शक्ति हैं, समना हैं, कुण्डलिनी-भगवती हैं, आप कामिनी अर्थात् कामेश्वरी रूपा हैं, आप लक्ष्मी हैं तथा स्वातन्त्र्य-शक्ति हैं, आप मालिनी, ललिता, अपराजिता, विजया, जया और उमा हैं - इस प्रकार सद्भक्त आपकी स्तुति करते हैं।
हे माता ! जो भक्त सूर्य-मण्डल में ठहरे हुए तथा नवीन लाक्षा-रस के समान लालिमा से युक्त आपके स्वरूप का ध्यान करते हैं, उन्हें कामदेव के बाणों से विद्ध-हृदय वाली सुन्दर-युवतियां सदा के लिए वश-वर्तिनी बनती हैं।
हे तपाये हुए स्वर्ण की भांति (जाज्वल्यमान) दीप्ति वाली देवी! मेरे मन को पवित्र कीजिये अर्थात् आप अपनी उपासना करने के योग्य बना दीजिए। अनन्त काल से उपार्जित मेरे विषयवासनात्मक पाप रूपी जंगल काट दीजिए। इसके अतिरिक्त संसार रूपी बन्दीगृह (जेलखाने) में फंसे हुए और इसीलिए विशेषपूर्वक (अहं ममात्मक जझीरों से) जकड़े हुए मुझको आप का सम्यक् ध्यान करने से ये सभी बन्धन कट जायें और मैं पारमार्थिक मोक्ष-धाम को प्राप्त करूं।
हे अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाली ! जन्म-मृत्यु से पीड़ित सभी प्राणियों के द्वारा वन्दन की गई चरण-कमलों वाली हे देवी! हे कमल-पत्रों की शोभा के समान नेत्रों की कान्ति युक्त बनी हुई माता! हे संकल्प-विकल्प-रूपी मालिन्य से रहित करने वाली राजहंसिनी ! आप अपने भक्तों पर आई हुई आपदाओं को नष्ट करती हैं, अतः मेरी आपदाओं का भी नाश कीजिए।
हे देवी ! आपके चरण कमलों की धूलि को प्रणाम करने के फलस्वरूप पवित्र बने हुए, पुण्यात्मा, प्रकांड विद्वान्, कृतकृत्य किन्हीं अलौकिक महान् कवियों ने तीनों लोकों में ऐसी त्रिलोक-व्यापि कीर्ति को प्राप्त किया होता है, जो दूध, चन्द्रमा, रेशमी वस्त्र तथा बर्फ के समान श्वेत अर्थात् कलंक-रहित होती है।
हे देवी! मेरे नेत्रों में केवल-मात्र आपके रूप का निर्णय करने का चाव बना रहे। मेरे कानों में आपके गुणानुवाद सुनने में ही राग अहर्निश प्राप्त हो। मेरे मन में केवल आपका हो स्मरण बना रहे। मेरे दोनों हाथों में आपके चरणों को पूजा करने की चतुरता प्राप्त हो जाये और मेरी वाणी आपकी गुण-कीर्तना ही करती रहे। इस रीति से मेरी इन्द्रियों को इस आपको उपासना करने की टॅव (आदत) कभी भी कम न हो अर्थात् सदा बनी रहे। भाव यह है कि मैं अपने समस्त जीवन-काल में आपकी पूजा के अतिरिक्त अन्य कोई भी व्यवहार न करूं।
कुण्डलिनी स्वरूपा त्रिपुरादेवी जब षट्चक्रों के भेदन करने के क्रम से उपासना की जाती है तो फिर वह त्रिपुरादेवी परिपूर्ण इच्छा-स्वातन्त्र्य के पारमार्थिक षट्चक्रसंबन्धी कमलों के समूह की चमक से चमचमाती हुई प्रकट होती है। तदनन्तर ही वह जगन्माता मोह रूपी मद-मस्त हाथी को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए मानो उद्यत भैरवीय चित्प्रकाश रूपी सिंह का विलासस्थान प्रकट करती है - ऐसी ही कुण्डलिनी रूप महात्रिपुरसुन्दरी को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो देवी गणेश और वटुकनाथ के द्वारा स्तुति की गई है, अर्थात् प्रणापान के प्रसर-प्रवेशात्मक क्रम से जिसका परामर्श अर्थात् अनुसंधान किया जाता है, जो रति सहित कामदेव से युक्त बनी हुई है, अर्थात् जो जगन्माता सशक्तिक इच्छा-स्वातन्त्र्य से संपत्र बनी हुई है, जो महादेवरूपी उत्तम आसन पर विराजमान है, कामदेव के पांच बाणों को ज़ो धारण करती है, अर्थात् जो अपनी इच्छा की स्वतंत्रता के फलस्वरूप चित्त, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच अनुपम शक्तियों से संपत्र बनी हुई है और जो अनङ्ग अर्थात् निराकार पांच चिदादि शक्ति रूपी फूलों से तथा ज्ञानसिद्धों, योगसिद्धों और चर्यासिद्धों से घेरी हुई है, ऐसी ही कदम्ब-वन में अर्थात् नन्दन वन में विराजमान महात्रिपुरसुन्दरी भगवती हमारी रक्षा करे।
परा पारमेश्वरी के इस कल्याणप्रद स्तोत्र का जो प्रतिदिन पाठ करता है अथवा श्रवण करता है, उसकी सभी मनोवांछित कामनाएं सफल बनती हैं और वह हरिण के समान चंचल वृत्ति वाली इन्द्रियों का अत्यन्त प्रिय बनता है। भाव यह है कि उसे अपनी इन्द्रियां स्वात्मानुसंधान की ओर लगाकर पारमार्थिक लाभ पहुँचाती हैं।
हे महासरस्वती देवी की ईश्वरी! हे जाग्रत-स्वप्न-सुषप्ति - इन तीन लोकों की स्वामिनी! हे जगन्माता! आपके स्वरूप को ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, नारायण, चन्द्रमा, सूर्यभगवान्, कुमार जी, गणेश जी और अग्निदेवता प्रणाम करते हैं। आप इस समस्त संसार के भीतर और बाहर ठहरी हुई हैं। आपको मेरा प्रणाम हो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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