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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 25
शर्वाणि ! सर्वजनवन्दित पादपदो ! पद्मच्छदच्छविविडम्बितनेत्रलक्ष्मि ! निष्पापमूर्ति जनमानसराजहंसि ! हंसि त्वमापदमनेकविधां जनस्य ।।
हे अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाली ! जन्म-मृत्यु से पीड़ित सभी प्राणियों के द्वारा वन्दन की गई चरण-कमलों वाली हे देवी! हे कमल-पत्रों की शोभा के समान नेत्रों की कान्ति युक्त बनी हुई माता! हे संकल्प-विकल्प-रूपी मालिन्य से रहित करने वाली राजहंसिनी ! आप अपने भक्तों पर आई हुई आपदाओं को नष्ट करती हैं, अतः मेरी आपदाओं का भी नाश कीजिए।
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