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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 18
त्वद्रूपमुल्लसितदाडिम पुष्परक्त- मुद्भावयेन्मदनदैवतमक्षरं यः। तं रूपहीनमपि मन्मथनिर्विशेष- मालोकयन्त्युरुनितम्बतटास्तरुण्यः।।
हे जगन्माता ! जो साधक प्रफुल्लित अनार के फूल की तरह लालिमा से युक्त एवं अविनश्वर कामराजबीजमय आपके स्वरूप को स्वात्माभेदरूपता से ध्यान करता है, ऐसा साधक लावण्य तथा रूप से रहित भी हो तथापि बड़े-बड़े सुन्दर कटितटों बाली युवतियां उसे मन्मथ अर्थात् कामदेव के समान ही अत्यन्त सुन्दर समझती हैं इस प्रकार उसे बड़े प्रेम से अपनाती हैं।
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