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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 14
मातर्मुहूर्तमपि यः स्मरति स्वरूपं लाक्षारस प्रसरतन्तुनिभं भवत्याः। ध्यायन्त्यनन्यमनसस्तमनङ्गतप्ताः प्रद्युम्नसीम्नि सुभगत्वगुणं तरुण्यः ।।
हे माता ! जो भक्त एक मुहूर्त के लिए भी आपके स्वरूप का ध्यान, प्रसारित हुए लाक्षारस के समान करता है; अर्थात् आपके स्वरूप का ध्यान परिपूर्ण प्रकाशरूपता से संयुक्त बना हुआ करता है, उसे कामदेव से पीड़ित बनी हुई युवतियां, अर्थात् मानसिक संकल्प-विकल्पों से संक्षुभित बनी हुई इन्द्रियां अपनी चञ्चलता को छोड़ कर कामदेव की नाईं अत्यन्त सुन्दर मानकर एकाग्रता से ध्यान करती हैं, अर्थात् उसकी सभी इन्द्रियां सदा के लिए उसके वशवर्ती बन जाती हैं।
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