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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 21
त्वामैन्दवीमिव कलामनुभालदेश- मुद्भासिताम्बरतलामवलोकयन्तः । सद्योभवानि ! सुधियः कवयो भवन्ति त्वं भावनाऽऽहितधियां कुलकामधेनुः ।।
हे जगन्माता ! चिदाकाश-स्वरूप को उत्तेजित करने वाली चन्द्र-कला के सदृश आपके स्वरूप का जो अपने मस्तक के स्थान पर साक्षात्कार करते हैं, वे साक्षात्कार करने के अनन्तर ही कवित्व-शक्ति-संपन्न अर्थात् सर्वज्ञ आदि गुणों से संयुक्त बनते हैं, यतः समाधि में आरूढ़ प्रज्ञा वालों के लिए आप ही समस्त कामनाओं को देने में समर्थ हैं।
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