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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 26
त्वत्पादपङ्कजरजः प्रणिपात पूतैः पुण्यैरनल्पमतिभिः कृतिभिः कवीन्द्रैः। क्षीरक्षपाकरटुकूलहिमावदाता कैरप्यवापि भुवनत्रितयेऽपि कीर्तिः ।।
हे देवी ! आपके चरण कमलों की धूलि को प्रणाम करने के फलस्वरूप पवित्र बने हुए, पुण्यात्मा, प्रकांड विद्वान्, कृतकृत्य किन्हीं अलौकिक महान् कवियों ने तीनों लोकों में ऐसी त्रिलोक-व्यापि कीर्ति को प्राप्त किया होता है, जो दूध, चन्द्रमा, रेशमी वस्त्र तथा बर्फ के समान श्वेत अर्थात् कलंक-रहित होती है।
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