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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 12
रूपं तंव स्फुरितचन्द्रमरीचिगौर- मालोकते शिरसि वागधिदैवतं यः। निःसीमसूक्तिरचनामृतनिर्भरस्य तस्य प्रसादमधुराः प्रसरन्ति वाचः ।।
जो भक्त, सरस्वती के मुख्य बने हुए (क्लीं) नामक आपके मन्त्र-स्वरूप को विकसित चन्द्रमा की किरणों की भांति श्वेतता से युक्त शिर पर ध्यान करता है, उस भक्त को सीमा-रहित सुन्दर उक्ति रूपी रचनामृत के प्रवाह से युक्त आपकी कृपा के फल-स्वरूप मधुर आकर्षक कवित्वमय वाणी प्रकट होती है।
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