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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 15
योऽयं चकास्ति गगनार्णवरत्नमिन्दु- र्योऽयं सुरासुरगुरुः पुरुषः पुराणः। यद्वाममर्धमिदमन्धकसूदनस्य देवि ! त्वमेव तदिति प्रतिपादयन्ति ।।
हे देवी ! आकाशरूपी समुद्र का रत्न बना हुआ जो यह चन्द्रमा चमक रहा है, जो यह देवताओं तथा असुरों के गुरु पुरातन पुरुष भगवान् नारायण हैं और जो अन्धकासुर राक्षस को मारने वाले महादेव जी की सुन्दर (अर्धांगिनी) पार्वती जी हैं। "ये सभी तीनों आपका ही स्वरूप हैं" इस प्रकार ज्ञानीजन सिद्ध करते हैं।
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