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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 17
रुद्राणि ! विद्रुममयीं प्रतिमामिव त्वां ये चिन्तयन्त्यरुणकान्तिमनन्यरूपाम्। तानेत्य पक्ष्मलदृशः प्रसभं भजन्ते कण्ठावसक्तमृदुबाहुलतास्तरुण्यः ।।
हे रुद्राणि ! जो भक्त 'विद्रुम' नामक मनके की भांति लाल रंग से युक्त बनी हुई एवं अनुपम प्रतिमा बनी हुई आपके स्वरूप का ध्यान करते हैं, ऐसे उपासकों के पास जाकर, उनके कण्ठ अर्थात् ग्रीवा में लगाये हुए कोमल बाहुलताओं वाली सुन्दर नेत्रों वाली युवतियां निःसंकोच होकर आलिंगन करती हैं।
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