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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 30
यस्स्तोत्रमेतदनुवासरमीश्वरायाः श्रेयस्करं पठति यः यदि वा शृणोति । तस्येप्सितं फलति राजभिरीडचतेऽसौ जायेत स प्रियतमो हरिणेक्षणानाम् ।।
परा पारमेश्वरी के इस कल्याणप्रद स्तोत्र का जो प्रतिदिन पाठ करता है अथवा श्रवण करता है, उसकी सभी मनोवांछित कामनाएं सफल बनती हैं और वह हरिण के समान चंचल वृत्ति वाली इन्द्रियों का अत्यन्त प्रिय बनता है। भाव यह है कि उसे अपनी इन्द्रियां स्वात्मानुसंधान की ओर लगाकर पारमार्थिक लाभ पहुँचाती हैं।
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