हे त्रिपुरा देवी ! जो भक्त आपके तेज से आकाश को सिन्दूर के रंग से रंगे हुए तथा लाक्ष-रस से लाल बनी हुई पृथ्वी को क्षणमात्र के लिए भी ध्यान करके देखता है, उसे इन्द्रिय-वृत्तियां लज्जा को त्याग कर अर्थात् बिना किसी रुकावट से पीछे-पीछे दौड़ती हैं अर्थात् पूर्ण रूप से स्ववशवर्ती बन जाती हैं।
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