मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 13
सिन्दूरपांसुपटलच्छुरितामिव द्यां त्वत्तेजसा जतुरसस्नपितामिवोर्वीम्। यः पश्यति क्षणमपि त्रिपुरे ! विहाय व्रीडां मृडानि ! सुदृशस्तमनुद्रवन्ति ।।
हे त्रिपुरा देवी ! जो भक्त आपके तेज से आकाश को सिन्दूर के रंग से रंगे हुए तथा लाक्ष-रस से लाल बनी हुई पृथ्वी को क्षणमात्र के लिए भी ध्यान करके देखता है, उसे इन्द्रिय-वृत्तियां लज्जा को त्याग कर अर्थात् बिना किसी रुकावट से पीछे-पीछे दौड़ती हैं अर्थात् पूर्ण रूप से स्ववशवर्ती बन जाती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें