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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 9
लक्ष्मीवशीकरणकर्मणिकामिनीना- माकर्षणव्यतिकरेषु च सिद्धमन्त्रः । नीरन्ध्रमोहतिमिरच्छिदुरप्रदीपो देवि ! त्वदऽङ्घ्रिजनितो जयति प्रसादः ।।
हे देवि । आपके चरणों से उत्पन्न अनुग्रह, अनन्त संपदाओं को वशीभूत करने में तथा कामिनियों अर्थात् अद्वैत-प्रधान अष्ट सिद्धियों को अपने स्वाधीन बनाने में सिद्ध राम-बाण की भांति अचूक मन्त्र है एवं घने अज्ञान रूपी अंधकार को छिन्न-भिन्न करने में दीपक के समान है। उसी आपकी दया की जय हो।
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