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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 29
गणेशवटुकस्तुता रतिसहायकामान्विता स्मरारिवरविष्टरा कुसुमबाणबाणैर्युता । अनङ्गकुसुमादिभिः परिवृत्ता च सिद्धैस्त्रिभिः कदम्बवनमध्यगा त्रिपुरसुन्दरी पातु नः ।।
जो देवी गणेश और वटुकनाथ के द्वारा स्तुति की गई है, अर्थात् प्रणापान के प्रसर-प्रवेशात्मक क्रम से जिसका परामर्श अर्थात् अनुसंधान किया जाता है, जो रति सहित कामदेव से युक्त बनी हुई है, अर्थात् जो जगन्माता सशक्तिक इच्छा-स्वातन्त्र्य से संपत्र बनी हुई है, जो महादेवरूपी उत्तम आसन पर विराजमान है, कामदेव के पांच बाणों को ज़ो धारण करती है, अर्थात् जो अपनी इच्छा की स्वतंत्रता के फलस्वरूप चित्त, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच अनुपम शक्तियों से संपत्र बनी हुई है और जो अनङ्ग अर्थात् निराकार पांच चिदादि शक्ति रूपी फूलों से तथा ज्ञानसिद्धों, योगसिद्धों और चर्यासिद्धों से घेरी हुई है, ऐसी ही कदम्ब-वन में अर्थात् नन्दन वन में विराजमान महात्रिपुरसुन्दरी भगवती हमारी रक्षा करे।
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