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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 23
ये चिन्तयन्त्यरुणमण्डलमध्यवर्तिरूपं तवाम्ब ! नवयावकपङ्कपिङ्गम्। तेषां सदैव कुसुमायुधबाणभिन्न वक्षस्थला मृगदृशो वशगा भवन्ति ।।
हे माता ! जो भक्त सूर्य-मण्डल में ठहरे हुए तथा नवीन लाक्षा-रस के समान लालिमा से युक्त आपके स्वरूप का ध्यान करते हैं, उन्हें कामदेव के बाणों से विद्ध-हृदय वाली सुन्दर-युवतियां सदा के लिए वश-वर्तिनी बनती हैं।
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