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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 8
कल्पद्रुमप्रसवकल्पितचित्रपूजा मुद्दीपित प्रियतमामदरक्तगीतिम्। नित्यं भवानि ! भवतीमुपवीणयन्ति विद्याधराः कनकशैलगुहागृहेषु ।।
हे पार्वती । विद्याधर-गण कल्प वृक्षों के पुष्यों से आपकी अनूठी पूजा करके सुवर्णमय सुमेरु पर्वत की कन्दराओं में अत्यन्त ज्वाज्वल्यमान तथा अपने प्रिय हर्ष-युक्त गीतों को सदैव वीणाओं पर बजाते रहते हैं तथा आपके गुणों का गान करते हैं।
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