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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 20
आधारमारुतनिरोधवशेन येषां सिन्दूररंजितसरोजगुणनुकारि। दीप्तं हृदि स्फुरति देवि ! वपुस्त्वदीयं ध्यायन्ति तानिह समीहितसिद्धसाध्याः ॥
हे देवी ! मूलाधार चक्र में प्राणापान रूपी वायु के, सुषुम्ना मार्ग में लय करने के फलस्वरूप जिन भक्तों के हृदय में सिन्दूर से रंगे हुए कमल-पुष्प के समान अत्यन्त प्रकाशमान् आपका स्वरूप विकसित होता है उन भक्तों को अभीष्ट प्राप्ति के लिए सिंद्ध-पुरुष तथा साध्य-देवता (सदैव) ध्यान करते रहते हैं, अर्थात् उन भक्तों को वरदान देने में तत्पर बने रहते हैं।
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