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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 28
उद्दामकामपरमार्थसरोजषण्ड- चण्डद्युतिद्युतिमुपासितषट्प्रकाराम्। मोहद्विपेन्द्रकदनोद्यतबोधसिंह- लीलागुहां भगवतीं त्रिपुरां नमामि ।।
कुण्डलिनी स्वरूपा त्रिपुरादेवी जब षट्चक्रों के भेदन करने के क्रम से उपासना की जाती है तो फिर वह त्रिपुरादेवी परिपूर्ण इच्छा-स्वातन्त्र्य के पारमार्थिक षट्चक्रसंबन्धी कमलों के समूह की चमक से चमचमाती हुई प्रकट होती है। तदनन्तर ही वह जगन्माता मोह रूपी मद-मस्त हाथी को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए मानो उद्यत भैरवीय चित्प्रकाश रूपी सिंह का विलासस्थान प्रकट करती है - ऐसी ही कुण्डलिनी रूप महात्रिपुरसुन्दरी को मैं प्रणाम करता हूँ।
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