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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 10
देवि ! त्वदऽङ्घ्रिनखरत्नभुवो मयूखाः प्रत्यग्रमौक्तिकरुचो मुदमुद्वहन्ति । सेवानतिव्यतिकरे सुरसुन्दरीणां सीमन्तसीम्निकुसुमस्तवकायितं यैः।।
हे देवी ! आपके चरणों के नाखून रूपी रत्नों से उत्पन्न सौन्दर्य की किरणें प्रत्येक नाखून के अग्रभाग पर मोती की कांति के समान चमक से आनन्द को प्राप्त करती हैं, तथा वे किरणें सेवा के कारण नत-मस्तक रहने वाली देवस्त्रियों के मांग के स्थान में गुलदस्ते की भांति आभा से युक्त दिखाई देती हैं।
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