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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 24
उत्तप्तहेमरुचिरे त्रिपुरे ! पुनीहि चेतश्चिरन्तनमघौघवनं लुनीहि। कारागृहे निगडबन्धनपीडितस्य त्वत्संस्मृतौ झटिति मे निगडास्त्रुटन्तु ।।
हे तपाये हुए स्वर्ण की भांति (जाज्वल्यमान) दीप्ति वाली देवी! मेरे मन को पवित्र कीजिये अर्थात् आप अपनी उपासना करने के योग्य बना दीजिए। अनन्त काल से उपार्जित मेरे विषयवासनात्मक पाप रूपी जंगल काट दीजिए। इसके अतिरिक्त संसार रूपी बन्दीगृह (जेलखाने) में फंसे हुए और इसीलिए विशेषपूर्वक (अहं ममात्मक जझीरों से) जकड़े हुए मुझको आप का सम्यक् ध्यान करने से ये सभी बन्धन कट जायें और मैं पारमार्थिक मोक्ष-धाम को प्राप्त करूं।
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