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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 3
देवि ! स्तुतिव्यतिकरे कृतबुद्धयस्ते वाचस्पति प्रभृतयोऽपि जडी भवन्ति। तस्मान्निसर्ग जडिमा कतमोऽहमन्त्र स्तोत्रं तव त्रिपुरतापनपत्नि ! कर्तुम् ।।
हे देवी ! आपके स्तुति-रचनात्मक परिश्रम करने में बुद्धि-पारंगत बने हुए बृहस्पतिपाद आदि विद्वान् भी मूक बन जाते हैं, अर्थात् आपकी स्तुति नहीं कर सकते हैं। इसलिए हे त्रिपुरारि शंकर की महारानी ! स्वभाव से ही जड अर्थात् मूर्ख मैं, आपको स्तुति करने में गिनती ही क्या रखता हूं।
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