हे देवी ! आपके स्तुति-रचनात्मक परिश्रम करने में बुद्धि-पारंगत बने हुए बृहस्पतिपाद आदि विद्वान् भी मूक बन जाते हैं, अर्थात् आपकी स्तुति नहीं कर सकते हैं। इसलिए हे त्रिपुरारि शंकर की महारानी ! स्वभाव से ही जड अर्थात् मूर्ख मैं, आपको स्तुति करने में गिनती ही क्या रखता हूं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।