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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 5
सूते जगन्ति भवती भवती बिभर्ति जागर्ति तत्क्षयकृते भवती भवानि। मोहं भिनत्ति भवती भवती रुणद्धि लीलायितं जयति चित्रमिदं भवत्याः ।।
हे माता ! आप इन सभी सांसारिक मण्डलों की उत्पत्ति करती हैं, इनका पालन पोषण करती हैं और इनका नाश करने के लिए होशियार अर्थात् सन्नद्ध बनी रहती हैं। इसके अतिरिक्त आप तिरोधानात्मक एवं अज्ञान रूपी मोह को काटती हैं तथा उस मोह को फिर से (आश्यानीभावात्त्मक) स्थिति देती हैं, अतः आपकी इस विचित्र लीलामय क्रीड़ा की जय हो ।
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