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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 4
मातस्तथापि भवर्ती भवतीव्रतापविच्छित्तये स्तुति महार्णव कर्णधारः । स्तोतुं भवानि स भवच्चरणारविन्दभक्तिग्रहः किमपि मां मुंखरी करोति ।।
हे माता ! हे भवानी ! (यद्यपि मैं आपकी स्तुति करने में असमर्थ हूं) क्योंकि आपकी स्तुति एक अथाह समुद्र के तुल्य है और इसके पार होना मनुष्य के पुरुषार्थ से बाहर है, तथापि आपके चरण-कमलों की अलौकिक भक्ति ही इस उपरोक्त स्तुति-रचनात्मक समुद्र में एक प्रवीण नाविक के समान सहायक है। वही भक्ति सांसारिक दुःखों को हटाने के निमित्त मुझे आपकी स्तुति करवाने में मुखर अर्थात् वाचाल बना देती है।
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