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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 7
पृथ्वी भुजोऽप्युदयनप्रवरस्य तस्य विद्याधर प्रणति चुम्बित पाद पीठः। यच्चक्रवर्तिपदवीप्रणयः स एव त्वत्पादपङ्कजरजः कणजः प्रसादः ।।
उस श्रेष्ठ राजा उदयन को, जो चक्रवर्ती पदवी की बढ़ाई प्राप्त हुई थी तथा जिस के राज्य-सिंहासन के पाद-पाठ को प्रणाम करके और चूम कर विद्याधर गण अपना अहोभाग्य समझते थे। (इस भांति उसके संपूर्ण ऐश्वर्य का होना) आपके ही चरण कमलों की धूलि के एक कण-मात्र की दया थी।
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