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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 6
यस्मिन्मनागपि नवाम्बुजं पत्र गौरि ! गौरि ! प्रसादमधुरां दृशमादधासि. । तस्मिन्निरन्तरमनङ्गशरावकीर्णसीमन्तिनीनयनसन्ततयः पतन्ति ।।
नवीन कमलों के पत्तों के समान श्वेत-वर्ण वाली हे पार्वती! दया से मधुर बनी हुई अपनी दृष्टि आप जिस भक्त पर तनिक मात्र भी डालती हैं उसकी ओर दया-पूर्ण दृष्टि से देखती हैं, उस भक्त का मानसिक संकल्प विकल्पों से छलनी बना हुआ मन तथा मन की वृत्तियों की पंक्ति सदा के लिए स्वयं अर्थात् बिना किसी प्रयास के निश्चेष्ट हो जाती हैं अर्थात् वह एकाग्र बन कर समाधि-निष्ठ बनता है।
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